26 December 2019
Last Update: 2019-12-26 00:00:00
वर्ष-10,अंक-65,26दिसंम्बर2019

 

 

 

 

वर्ष-10,अंक-65,26दिसंम्बर2019/

पोह(अमावस),(ना.शा.)551.

. आज का विचार .

न्यूनतम आवश्यक्ताओं की पूर्ति के अभाव में मनुष्य विभिन्न रोगों से ग्रस्त जाता है। कुपोष्ण का शिकार बालक जीवन को बोझ की तरह ढोते हैं। कमजोर शरीर, मुरझाए चेहरे लिए यह मनुष्य जीवन की खूबसूरती व प्रत्येक खुशी से वंचित रहते हैं। अपनी और अपने ऊपर निर्भर व्यक्तियों की आवश्यक्ताएँ पूरी ना कर पाने का दुख उन्हें परेशान किए रहता है। कई आत्महत्या की ओर अग्रसर होने को विवश हो  जाते हैँ। अधिक निराश आतंकवाद के पथ पर समस्त मानवता की खुशियाँ छीनने लगते हैं।

इस समस्या का एकमात्र समाधान मनुष्य की न्यूनतम आवश्यक्ताओं को उस का मौलिक अधिकार बनाना है। इन की पूर्ति समाज का ही ध्येय होना चाहिए। जो जन्म ले, उसे खाने, वस्त्र और गृहस्थान की चिंता नहीं ही होनी चाहिए।

.भारत का इतिहास-58 .

 

मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा में खड़ी हुई अर्धनग्न नारी की बहुत मृण्मय मूर्तियाँ मिली हैं, इनके शरीर पर छोटा सा लहंगा है, जिसे कटि प्रदेश पर मेखला से बाँधा गया है। गले में हार पड़ा हुआ है तथा मस्तक पर पंखे के आकार की विचित्र शिराभूषा है। इसके दोनों ओर प्याले जैसा पदार्थ है, जिसमें लगे धुएँ के निशान से यह ज्ञात होता है कि इनमें भक्तों द्वारा देवी को प्रसन्न करने के लिए तेल या धूप जलाया जाता था। इस प्रकार की मूर्तियाँ पश्चिमी एशिया में भी मिली हैं। ये उस समय की मातृदेवी की उपासना की व्यापकता की सूचित करती हैं। आज भी  भारत की साधारण जनता में देवी की उपासना बहुत प्रचलित है। इन मूर्तियों के बहुत अधिक मात्रा में पाये जाने से यह कल्पना की गई है कि वर्तमान कुल देवताओं की भाँति प्रत्येक घर में इनकी प्रतिष्ठा और पूजा की जाती थी। पुरुष देवताओं में पशुपति प्रधान प्रतीत होता है। एक मुहर में तीन मुँह वाला एक नग्न व्यक्ति चौकी पर पद्मासन लगाकर बैठा हुआ है। इसके चारों ओर हाथी तथा बैल हैं। चौकी के नीचे हिरण है, उसके सिर पर सींग और विचित्र शिरोभूषा है। इसने हाथों में चूड़ियाँ और गले में हार पहन रखा है। यह मूर्ति शिव के पशुपति रूप की समझी जाती है। पद्मासन में ध्यानावस्थित मुद्रा में इसकी नासाग्र दृष्टि शिव के योगेश्वर या महायोगी रूप को सूचित करती है। तीन अन्य मुहरें पशुपति के इस रूप पर प्रकाश डालती हैं। अनेक विद्वानों ने मोहनजोदड़ो की अति प्रसिद्ध शालधारिणी मूर्ति का भी योग से सम्बन्ध जोड़ा है।

  इतिहास व संस्कृति .

1891 -ड्रेक्सेल विश्वविद्यालय फिलाडेल्फिया में कला, विज्ञान और उद्योग के ड्रेक्सेल संस्थान के रूप में

      उद्घाटन किया गया।

1903 -राइट बंधुओं ने द फ्लायरनामक विमान पहली बार उड़ाया था। 12 सेकेंड की इस उड़ान ने

      दुनिया में क्रांति ला दी थी।

1907 -उग्येन वांगचुक भूटान के पहले वंशानुगत राजा बने।

1928- लाला लाजपात राय की हत्या का बदला लेने के लिए भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने उन पर

     लाठी चार्ज करने वाले ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सांडर्स की हत्या कर दी।

1938- जर्मन रसायनशास्त्री ओटो हान ने यूरेनियम के नाभिकीय विखंडन की खोज की।

1940- महात्मा गांधी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन स्थगित किया।

1949- बर्मा (अब म्यांमार) ने साम्यवादी चीन को मान्यता दी।

1971 -भारत और पाकिस्तान के बीच तीसरा युद्ध पाकिस्तान के विभाजन के परिणाम स्वरुप बांग्लादेश

       के अस्तित्व में आने के बाद समाप्त हुआ।

1981- राष्ट्रपति रीगन के आदेश के अनुसार संयुक्त राज्य अमेरिका में आपातकालीन मोबिलाइजेशन बोर्ड

      की स्थापना की गई।

1987 -मेगा मैन जापान में जारी किया गया।

1996 -नेशनल फुटबाल लीग का शुभारंभ हुआ।

1998- अमेरिकी और ब्रिटिश बम वर्षकों ने आपरेशन डेजर्ट फ़ाक्सके तहत इराक पर भारी बमबारी की।

2005- भूटान के राजा जिग सिगमे वांचुक को सत्ता से हटाया गया।

2009- लेबनान के समुद्री तट पर कार्गो जहाज एमवी डैनी एफ टू के डूबने से 40 लोगों तथा 28000 से

      अधिक पशुओं की मौत हो गयी।

2013- एंजेला मार्केल तीसरी बार जर्मनी के चांसलर पद के लिए चुने गए।

2014- अमेरिका और क्यूबा ने 55 साल के बाद दोबारा कूटनीतिक संबंधों को बहाल किया।

बांग्लादेश 

पड़ोसी की तरक्की खुशी और जलन दोनों तरह के भाव लेकर आ सकती है. तीसरा तरीका ये होता है कि पड़ोसी की तरक्की से आपमें स्वस्थ प्रतियोगिता का भाव आए और आप उससे भी तेजी से तरक्की करने की कोशिश करें. सबसे अच्छा रास्ता तीसरा वाला है, क्योंकि इसमें हर किसी का भला है.

इस दार्शनिक विचार के साथ अगर आप उन खबरों को पढ़ें, जिन्हें देसी और ग्लोबल मीडिया बार-बार छाप रहा है कि एशियन डेवलपमेंट बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश ने आर्थिक विकास दर में भारत को काफी पीछे छोड़ दिया है, या कि भारत को बांग्लादेश से तरक्की करने का तरीका सीखना चाहिए या जब विश्व बैंक के हवाले से ये खबर छापी जाए कि प्रति व्यक्ति आय के मामले में बांग्लादेश 2020 तक भारत को पीछे छोड़ देगा, तो हमारी यानी भारत की प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिएया जब ये रिपोर्ट आती है कि मानव विकास के मापदंडों खासकर स्वास्थ्य के क्षेत्र में बांग्लादेश ने भारत को पीछे छोड़ दिया है और बांग्लादेश का एक औसत आदमी 72 साल जीता है, जबकि भारत में ये आयु 68 साल और पाकिस्तान में यही उम्र 66 साल है तो हमारी क्या प्रतिक्रिया होनी चाहिए?

भारत के लोगों के दिमाग में बांग्लादेश की एक खास छवि है, जिसकी जड़ें समकालीन इतिहास में है. बांग्लादेश भारत के बाद बना हुआ राष्ट्र है और इसके बनने की कहानी काफी दर्दनाक है. पाकिस्तान के बांग्ला-भाषी इलाकों में जब अत्याचार बहुत बढ़ गया तो वहां मुक्ति संग्राम छिड़ गया, जिसमें भारत ने सहयोग दिया. बांग्लादेश की मुक्ति वाहिनी को ट्रेनिंग और हथियार भारत ने दिए. आखिरकार 1971 में पाकिस्तानी फौज ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और बांग्लादेश अस्तित्व में आया. ये सब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में हुआ. लेकिन इन सब के बीच कई लाख शरणार्थी बांग्लादेश से भारत आ गये


1971 में बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था बुरी तरह तबाह थी, जिसे संभलने में समय लगा. इसके परिणामस्वरूप शरणार्थियों का भारत आना आगे भी जारी रहा. इस वजह से हमारे दिमाग में बांग्लादेशियों की छवि गरीब, लाचार शरणार्थियों वाली बनी हुई है, जो अकारण भी नहीं है. इसके अलावा बांग्लादेशियों की एक छवि भाजपा ने भी बनाई है. भाजपा का मानना है कि बांग्लादेश से बड़ी संख्या में मुसलमान शरणार्थी भारत आए हैं और ये सिलसिला जारी है. भाजपा घुसपैठ को मुस्लिम समस्या के रूप में देखती है, इसलिए भाजपा सरकार ने जब नागरिकता संशोधन विधेयक तैयार किया तो बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आने वाले हिंदू, सिख, बौध, जैन, पारसी, ईसाई मतावलंबियों को नागरिकता देने का प्रावधान किया गया. इसमें इस्लाम धर्म का जिक्र नहीं है.

भाजपा और आरएसएस का ये भी मानना है कि मुस्लिम शरणार्थियों, भाजपा उन्हें घुसपैठिए कहती हैं, के आने से भारत के कई इलाकों में आबादी की धार्मिक संरचना बदल रही है. शिवसेना को लगता है कि अवैध बांग्लादेशियों की वजह से मुंबई में मराठी लोग अल्पसंख्यक हो जाएंगे. लोक मानस में ये धारणा भी है कि ये शरणार्थी भारत पर बोझ हैं और कई तरह के अपराधों में भी ये लिप्त पाए जाते हैं. इनमें से कई धारणाएं सही भी हो सकती हैं.

इसलिए जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह बांग्लादेशी शरणार्थियों को घुसपैठिया और दीमक कहते हैं और उनको खदेड़ने की बात करते हैं तो जनता खूब तालियां बजाती हैं. असम में तो कई दशक तक असम आंदोलन इसी मांग को लेकर चला कि बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर निकाला जाए.

असम में बने नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन यानी एनआरसी का मकसद ऐसे ही लोगों की पहचान करना है, जो 1971 के बाद भारत चले आए और जिनके पास अपनी नागरिकता साबित करने का कोई प्रमाण नहीं है. एनआरसी की फाइनल लिस्ट में असम के 19 लाख लोगों के नाम नहीं हैं. हालांकि भाजपा इस लिस्ट से संतुष्ट नहीं है क्योंकि इस लिस्ट में काफी हिंदू भी शामिल हैं. ये समझ पाना मुश्किल है कि एनआरसी की नागरिकता-विहीन लिस्ट में इतने हिंदू कैसे हैं. क्या इसकी वजह ये हो सकती है कि बांग्लादेश से आने वालों में बड़ी संख्या हिंदू दलितों की है, जो आजादी के समय वहीं रह गए थे. इस बारे में और अध्ययन किए जाने की जरूरत है.


गरीब बांग्लादेश से शरणार्थियों के भारत आने का एक कारण ये बताया जाता है कि दोनों देशों के लोगों की आर्थिक हैसियत में फर्क है और गरीबी और भुखमरी के कारण बांग्लादेश के गरीब लोग भारत आ जाते हैं.

लेकिन अगर ये तर्क ही खत्म हो जाए कि भारत की आर्थिक स्थिति बांग्लादेश से बेहतर है, तो भी क्या बांग्लादेश से शरणार्थियों का भारत आना जारी रहेगाअगर भारत की तुलना में बांग्लादेश में रोजगार के मौके बेहतर हों और वहां प्रति व्यक्ति आय भी भारत से बेहतर हो, तो भी क्या कोई बांग्लादेशी नागरिक अवैध तरीके से सीमा लांघकर भारत में आ कर घुसपैठिये की तरह जीना चाहेगाभारत की तुलना में अगर बांग्लादेश में स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थितियां बेहतर हों और स्त्री-पुरुष असमानता भी कम हो, तो भी क्या भारत के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या बनी रहेगीइस बात को इस तरह से समझें कि क्या अमेरिका के लोग घुसपैठ करके मेक्सिको जाना चाहेंगे?

  जीवनी .

समाजसेवी बाबा आमटे

मुरलीधर देविदास आमटे साधारणतः भारत सामाजिक कार्यकर्ता और सामाजिक एक्टिविस्ट के नाम से जाने जाते है। विशेषतः वे कुष्ट रोग से तड़प रहे गरीबो की पुनः प्रतिष्टा और सशक्तिकरण के कार्य के लिए प्रसिद्ध है।

बाबा आमटे का जन्म 26 दिसम्बर 1914 को महाराष्ट्र के वर्धा जिले के हिंगनघाट शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम देविदास आमटे और उनकी माता का नाम लक्ष्मीबाई आमटे था। उनका परिवार धनि था। उनके पिता ब्रिटिश गवर्नमेंट ऑफिसर थे, उन्हें डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन और रेवेन्यु कलेक्शन की जिम्मेदारियाँ दे रखी थी। बचपन में ही मुरलीधर को अपना उपनाम बाबा दिया गया था।

उन्हें बाबा इसलिए नही कहा जाता था की वे कोई संत या महात्मा थे, बल्कि उन्हें इसलिए बाबा कहा जाता था क्योकि उनके माता-पिता ही उन्हें इस नाम से पुकारते थे।

एक धनि परिवार के बड़े बेटे होते हुए मुरलीधर का बचपन काफी रमणीय था। समय के साथ-साथ वे भी चौदह साल के हुए और उन्होंने अपनी खुद की गन (बंदूक) ले ली और उससे वे सूअर और हिरन का शिकार किया करते थे। जब वे गाड़ी चलाने जितने बड़े हुए तब उन्हें एक स्पोर्ट कार दी गयी थी जिसे चीते की चमड़ी से ढका गया था। उन्हें कभी निचली जाती के बच्चो के साथ खेलने से नही रोका गया था। बचपन से ही उन्हें जातिभेद में भरोसा नही था, वे सभी को एक समान मानते थे और हमेशा से कहते थे की उनका परिवार इस सामाजिक भेदभावो को नही मानता।

कानून विषय पर उन्होंने वर्धा में खास अभ्यास कर रखा था, जल्द ही वे भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल हो गए और भारत को ब्रिटिश राज से मुक्ति दिलाने में लग गए और भारतीय स्वतंत्रता नेताओ के लिए वे बचावपक्ष वकील का काम करते थे,

1942 के भारत छोडो आन्दोलन में जिन भारतीय नेताओ को ब्रिटिश सरकार ने कारावास में डाला था उन सभी नेताओ का बचाव बाबा आमटे ने किया था। इसके बाद थोडा समय उन्होंने महात्मा गाँधी के सेवाग्राम आश्रम में बिताया और गांधीवाद के अनुयायी बने रहे। इसके बाद जीवन भर वे गांधी विचारो पर चलते रहे, जिसमे चरखे से उन की कटाई करना और खादी कपडे पहनना भी शामिल है। जब गांधीजी को पता चला की आमटे ने ब्रिटिश सैनिको से एक लड़की की जान बचायी है तो गांधीजी ने आमटे को अभय साधकका नाम दिया।

उस दिनों कुष्ट रूप समाज में तेज़ी से फ़ैल रहा था और बहोत से लोग इस बीमारी से जूझ रहे थे। लोगो में ऐसी ग़लतफ़हमी भी फ़ैल गयी थी की यह बीमारी जानलेवा है। लकिन आमटे ने लोगो की इस ग़लतफ़हमी को दूर किया और कुष्ट रोग से प्रभावित मरीज के इलाज की उन्होंने काफी कोशिशे भी की। बल्कि ये भी कहा जाता था की कुष्ट रोग से ग्रसित मरीज के संपर्क में आने से स्वस्थ व्यक्ति में भी यह बीमारी फ़ैल सकती है लेकिन फिर भी इन सभी बातो पर ध्यान न देते हुए उन्होंने हमेशा कुष्ट रोग से पीड़ित मरीजो की सेवा की और उन का इलाज भी करवाया।

आमटे ने गरीबो की सेवा और उनके सशक्तिकरण और उनके इलाज के लिए भारत के महाराष्ट्र में तीन आश्रम की स्थापना की। 15 अगस्त 1949 को उन्होंने आनंदवन में एक पेड़ के निचे अस्पताल की शुरुवात भी की। 1973 में आमटे ने गडचिरोली जिले के मदिया गोंड समुदाय के लोगो की सहायता के लिए लोक बिरादरी प्रकल्प की स्थापना भी की थी।

बाबा आमटे ने अपने जीवन को बहुत से सामाजिक कार्यो में न्योछावर किया, इनमे मुख्य रूप से लोगो में सामाजिक एकता की भावना को जागृत करना, जानवरों का शिकार करने से लोगो को रोकना और नर्मदा बचाओ आन्दोलन शामिल है। उनके कार्यो को देखते हुए 1971 में उन्हें पद्म श्री अवार्ड से सम्मानित किया गया।

आमटे का विवाह इंदु घुले (साधना आमटे) से हुआ था। उनकी पत्नी भी उनके साथ सामाजिक कार्यो में भाग लेती थी और कदम से कदम मिलाकर जनसेवा करती थी। उनके दो बेटे डॉ. विकास आमटे और डॉ. प्रकाश आमटे और दो बहु डॉ. मंदाकिनी और डॉ. भारती है, सभी डॉक्टर है। इन चारो ने हमेशा सामाजिक कार्यो में अपना योगदान दिया और हमेशा वे अपने पिता के नक्शेकदम पर ही चलते रहे।

उनका बेटा डॉ. प्रकाश आमटे और उनकी पत्नी डॉ. मंदाकिनी आमटे महाराष्ट्र के गडचिरोली जिले के हेमलकसा ग्राम में मदिया गोंड समुदाय के लोगो के लिए एक स्कूल और एक अस्पताल चलाते थे। प्रकाश आमटे से विवाह करने के बाद मंदाकिनी आमटे ने गवर्नमेंट मेडिकल जॉब छोड़ दिया और अस्पताल और स्कूल चलाने के लिए हेमलकसा चली गयी थी और साथ ही जंगलो में घायल हुए जानवरों का इलाज भी करती थी।

उनके दो बेटे है, पहला बेटा दिगंत, डॉक्टर है और दूसरा बेटा अनिकेत एक इंजिनियर है। इन दोनों ने भी कई सामाजिक कार्य किये है। 2008 में प्रकाश और मंदानिकी के सामाजिक कार्यो को देखते हुए उन्हें मेगसेसे अवार्ड से सम्मानित किया गया था।

बाबा आमटे का बड़ा बेटा विकास आमटे और उनकी पत्नी भारती आमटे आनंदवन में एक अस्पताल चलाते है और कई ऑपरेशन भी करते है।

वर्तमान में आनंदवन और हेमलकसा ग्राम में एक-एक ही अस्पताल है। आनंदवन में एक यूनिवर्सिटी, एक अनाथाश्रय और अंधो और गरीबो के लिए एक स्कूल भी है। आज स्व-संचालित आनंदवन आश्रम में तक़रीबन 5000 लोग रहते है। महाराष्ट्र के आनंदवन का सामाजिक विकास प्रोजेक्ट आज पुरे विश्व तक पहुच चूका है। आनंदवन के बाद आमटे ने कुष्ट रोग से पीड़ित मरीजो के इलाज के लिए सोमनाथ और अशोकवन आश्रम की भी स्थापना की थी।

मेधा पाटकर के साथ मिलकर नर्मदा बचाओ आन्दोलन

1990 में मेधा पाटकर के साथ मिलकर नर्मदा बचाओ आन्दोलन करने के लिए उन्होंने आनंदवन छोड़ दिया था। जिसमे नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध बनाने के लिए वे संघर्ष कर रहे थे और स्थानिक लोगो द्वारा नर्मदा नदी के तट पर की जा रही गन्दगी की रोकने की कोशिश भी कर रहे थे।

बाबा आमटे को प्राप्त अवार्ड

पद्म श्री, 1971
रमण मेगसेसे अवार्ड, 1985
पद्म विभूषण, 1986
मानव अधिकार के क्षेत्र में अतुल्य योगदान के लिए यूनाइटेड नेशन प्राइज, 1988
गाँधी शांति पुरस्कार, 1999
राष्ट्रिय भुषण, 1978 : FIE फाउंडेशन इचलकरंजी (भारत)
जमनालाल बजाज अवार्ड, 1979
एन.डी. दीवान अवार्ड, 1980 : NASEOH, मुंबई
रामशास्त्री अवार्ड, 1983 : राम्शात्री प्रभुने संस्था, महाराष्ट्र, भारत
• 
इंदिरा गांधी मेमोरियल अवार्ड, 1985 : सामाजिक कार्यो को देखते हुए मध्य प्रदेश सरकार द्वारा दिया गया
• 
राजा राम मोहन रॉय अवार्ड, 1986 : दिल्ली
फ्रांसिस मश्चियो प्लैटिनम जुबिली अवार्ड, 1987 : मुंबई
जी.डी. बिरला इंटरनेशनल अवार्ड, 1987 : मानवता के विकास में योगदान के लिए
टेम्पलेटन प्राइज, 1990 (बाबा आमटे और चार्ल्स बिर्च को संयुक्त रूप से यह पुरस्कार दिया गया था)
महादेव बलवंत नातू पुरस्कार, 1991, पुणे, महाराष्ट्र
आदिवासी सेवक अवार्ड, 1991, भारत सरकार
कुसुमाग्रज पुरस्कार, 1991
• 
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर दलित मित्र अवार्ड, 1992, भारत सरकार
श्री नेमीचंद श्रीश्रिमल अवार्ड, 1994
फ्रांसिस टोंग मेमोरियल अवार्ड, 1995, वोलूंट्री हेल्थ एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया
कुष्ट मित्र पुरस्कार, 1995 : विदर्भ महारोगी सेवा मंडल, अमरावती, महाराष्ट्र
भाई कन्हैया अवार्ड, 1997 : श्री गुरु हरिकृष्ण शिक्षण संस्था, भटिंडा, पंजाब
मानव सेवा अवार्ड, 1997 : यंग मैन गांधियन एसोसिएशन, राजकोट, गुजरात
सारथि अवार्ड, 1997, नागपुर, महाराष्ट्र
• 
महात्मा गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट अवार्ड, 1997, नागपुर, महाराष्ट्र
गृहिणी सखी सचिव पुरस्कार, 1997, गदिमा प्रतिष्ठान, महाराष्ट्र
कुमार गंधर्व पुरस्कार, 1998
अपंग मित्र पुरस्कार, 1998, अपंगो के सहायक, कोल्हापुर, महाराष्ट्र
• 
भगवान महावीर मेहता अवार्ड, 1998, मुंबई
दिवालिबेन मोहनलाल मेहता अवार्ड, 1998, मुंबई
जस्टिस के.एस. हेगड़े फाउंडेशन अवार्ड, 1998, कर्नाटक
बया कर्वे अवार्ड, 1998, पुणे महाराष्ट्र
• 
सावित्रीबाई फुले अवार्ड, 1998, भारत सरकार
फेडरेशन ऑफ़ इंडियन चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री अवार्ड, 1988 : FICCI
सतपुल मित्तल अवार्ड, 1998, नेहरु सिद्धांत केंद्र ट्रस्ट, लुधियाना, पंजाब
आदिवासी सेवक पुरस्कार, 1998, महाराष्ट्र राज्य सरकार
गाँधी शांति पुरस्कार, 1999
डॉ. आंबेडकर इंटरनेशनल अवार्ड फॉर सोशल चेंज, 1999
महाराष्ट्र भुषण अवार्ड, 2004, महाराष्ट्र सरकार
भारथवासा अवार्ड, 2008
सम्माननीय पदवी (टाइटल)
डी.लिट (D.Litt), टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस, मुंबई, भारत
डी.लिट (D.Litt), 1980 : नागपुर यूनिवर्सिटी, नागपुर, भारत
कृषि रत्न, 1981 : सम्माननीय डॉक्टरेट, PKV कृषि यूनिवर्सिटी, अकोला, महाराष्ट्र, भारत
डी.लिट (D.Litt), 1985-86 : पुणे यूनिवर्सिटी, पुणे, भारत
देसिकोत्तमा, 1988 : सम्माननीय डॉक्टरेट, विश्व-भारती उनिवेर्सित्य्म शांतिनिकेतन, पश्चिम बंगाल, भारत
गाँधी ने आमटे को अभय साधक का नाम दिया था।

 
 

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