06 December 2019
Last Update: 2019-12-06 00:00:00
वर्ष-10,अंक-55,6दिसंम्बर2019

 

 

 

 

वर्ष-10,अंक-55,6दिसंम्बर2019/

मघर(सुदी)10,(ना.शा.)551.

. आज का विचार .

मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिये पर्यावरण की चिंता भी नहीं की। अधिक्तर पशुओं को घरेलू बना लिय़ा है। जंगल के पेड़ों को काट कर लकड़ी का सामान बना लिया है अथवा ईधन में जला दिया है। प्राप्त भूमि पर खेती कर ली है। पर्वतों की सड़कें बनाने अथवा रेल की पटऱी बिछाने हेतु कटाई कर दी गई है।  पर्यटकों के भ्रमणस्थल विकसित करने के लिये होटल, रेस्तराँ और सराय आदि के आकाश छूते भवन निर्मित किये गये हैं। बहती नदियों पर बाँध बना लिये गये हैं और उन की जल-धारा को कृत्म नाले, खालों में डाल दिया गया है। और तो और, भारत सरकार देश की नदियों को एक दूसरे से जोड़ने को उत्सुकता दिखा रही है।

पर्यावरण से यह खेल क्यों?

.भारत का इतिहास-47 .

 

नगर की पश्चिमी टीले पर सम्भवतः सुरक्षा हेतु एक 'दुर्ग' का निर्माण हुआ था जिसकी उत्तर से दक्षिण की ओर लम्बाई 460 गज एवं पूर्व से पश्चिम की ओर लम्बाई 215 गज थी। ह्वीलर द्वारा इस टीले को 'माउन्ट ए-बी' नाम प्रदान किया गया है। दुर्ग के चारों ओर क़रीब 45 फीट चौड़ी एक सुरक्षा प्राचीर का निर्माण किया गया था जिसमें जगह-जगह पर फाटकों एव रक्षक गृहों का निर्माण किया गया था। दुर्ग का मुख्य प्रवेश मार्ग उत्तर एवं दक्षिण दिशा में था। दुर्ग के बाहर उत्तर की ओर 6 मीटर ऊंचे 'एफ' नामक टीले पर पकी ईटों से निर्मित अठारह वृत्ताकार चबूतरे मिले हैं जिसमें प्रत्येक चबूतरे का व्यास क़रीब 3.2 मीटर है चबूतरे के मध्य में एक बड़ा छेद हैं, जिस में लकड़ी की ओखली लगी थी, इन छेदों से जौ, जले गेहूँ एवं भूसी के अवशेष  मिलते हैं। इस क्षेत्र में श्रमिक आवास के रूप में पन्द्रह मकानों की दो पंक्तियां मिली हैं जिनमें सात मकान उत्तरी पंक्ति आठ मकान दक्षिणी पंक्ति में मिले हैं। प्रत्येक मकान में एक आंगन एवं क़रीब दो कमरे अवशेष प्राप्त हुए हैं। ये मकान आकार में 17x7.5 मीटर के थे। चबूतरों के उत्तर की ओर निर्मित अन्नागारों को दो पंक्तियां मिली हैं, जिनमें प्रत्येक पंक्ति में 6-6 कमरे निर्मित हैं, दोनों पंक्तियों के मध्य क़रीब 7 मीटर चौड़ा एक रास्ता बना था। प्रत्येक अन्नागार क़रीब 15.24 मीटर लम्बा एवं 6.10 मीटर चौड़ा है।

  इतिहास व संस्कृति .

 6-दिसम्बर का इतिहास:

  • 1768-एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका का पहला संस्करण
  • १९१७ -फिनलैंड ने रूस से स्वतंत्रता की घोषणा की
  • 1922- आयरिश स्वतंत्र राज्य आधिकारिक रूप से अस्तित्वमें आया। जॉर्ज पंचम इसके राजाटिम हीली, पहले राज्यपाल और डब्लुटी कॉस्ग्रेव, कार्यकारी परिषद का अध्यक्ष बने।
  • १९४६ - भारत में होमगार्ड की स्थापना हुई।
  • १९५६ - भारतीय संविधान के निर्माता डॉ॰ भीमराव आंबेडकर का दिल्ली में महापरिनिर्वाण (निधन) हुआ।
  • 1992 - एक भारी भीड़ (कारसेवक) ने अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद को गिरा दिया और वहीं पर एक प्रतीकात्मक राम मन्दिर का निर्माण कर दिया।
  • 1997 - क्योटो (जापान) में अंतर्राष्ट्रीय जलवायु सम्मेलन प्रारम्भ।
  • 1998 - बैंकॉक में 13वें एशियाई खेलों की शुरुआत, इटली को हराकर स्वीडन लगातार दूसरी बार डेविस कप विजेता बना।
  • 1999 - इंडोनेशियाई जेल से 283 क़ैदी फ़रार।
  • 2001 - अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान हथियार डालने पर सहमत।
  • 2002 - स्पेन के कार्लोस मोया को 'एटीपी यूरोपियन प्लेयर आफ़ द इयर' ख़िताब दिया गया।
  • २००६ - नासा ने मार्स ग्लोबल सर्वियर द्वारा खिंचे चित्रों को सार्वजनिक किया।
  • 2007 - आस्ट्रेलिया के स्कूलों में सिक्ख छात्रों को कृपाण साथ ले जाने और मुस्लिम छात्राओं को कक्षाओं में हिजाब पहनने की इजाजत मिली।

अयोध्या

अयोध्या पर फैसला आने की सुबह के साढ़े सात बजे पड़ोस में सब्जी बेचने वाले एक युवक ने अचानक पूछ लिया कि बाबूजी! आज क्या होने वाला है? मैंने कहा कि हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट मंदिर की समस्या को निपटा दे। मंदिर बनवा दे। वह बोला मस्जिद का क्या होगा? मैंने कहा कि हो सकता है कि अदालत मस्जिद के लिए भी कोई व्यवस्था कर दे! वह तपाक से बोला यही ठीक होगा। अगले रोज सोसाइटी के गेट से निकलते ही एक बुद्धिजीवी मित्र टकरा गए। देखते ही उलाहना देने लगे कि करवा दिया फैसला’! मैंने मजाक में कहा हुइहै वही, जो राम रचि राखातो वे उपहास में जोर से हंसे मानो मैंने कोई अपराध कर दिया हो।

सब्जी वाले की चिंता थी कि मंदिर-मस्जिद का मामला हमेशा के लिए निपट जाए। मंदिर बने तो मस्जिद भी बन जाए! लेकिन बुद्धिजीवी जी की मंशा फैसले की हंसी उड़ाने की थी। बता दूं कि सब्जी बेचने वाला युवक मुसलमान नहीं है! न वह किसी दल का राजनीतिक कार्यकर्ता है, बल्कि अपनी सब्जी बेच कर रोजी-रोटी कमाने से मतलब रखने वाला आम आदमी है। साधारण मनुष्य सरलता से सोचता समझता है, जबकि पढ़े-लिख बुद्धिजीवी वर्ग का काम सरल को भी असरलबनाने का होता है। और इन दिनों बुद्धिजीवी कोई मनीषीनहीं होते, वे या तो एनजीओ छाप होते हैं या एडवोकेसी समूह के प्रवक्ता होते हैं, जो किसी भी विवादके बने रहने में ही अपना करिअर समझते हैं।  
कहने की जरूरत नहीं कि अयोध्या में मंदिर-मस्जिद संबंधी फैसले के आने के बाद ऐसे ही तत्व सबसे अधिक चिंतितनजर आते हैं। वे सोचते हैं कि अगर मंदिर-मस्जिद विवाद निपट गया, तो वे बेरोजगार हो जाएंगे! साधारण जीवन जीने वाला आदमी भी किसी जटिल समस्या को अपनी सहजानुभूति और सहज बुद्धि से सीधे तरीके से समझता है जबकि बुद्धिजीवी तर्क-वितर्क की गांठलगाकर समझता है। इस मामले में बाबरी की जगह पर आर्कियोलॉजिकल सर्वे द्वारा की जाती खुदाईपर लगाई जाती राजनीतिक गांठोंको देखा जा सकता है कि किस तरह बाबरी के नीचे दबे गैर इस्लामिकअवशेषों पर तरह-तरह की शंकाएं और प्रश्न उठाए गए और अब जब अदालत ने उस सर्वे की रिपोर्ट पर मुहर लगा दी, तो सारे विशेषज्ञ अचानक बहस से बाहर हो गए। और, यह तो इतिहास सिद्ध है कि मध्यकाल में जो इस्लामी आक्रांता आते थे, तो वे प्रसादबांटने नहीं आते थे, बल्कि अपनी विजयी धर्मध्वजाभी फहराने आते थे और यह भी सच है कि कई इस्लामी आक्रांता तो गजवा ए हिंदका इरादा लेकर भी आए थे। यह एक कटु-सत्य है। तब, क्या पता बाबरी गजवा ए हिंदका ही एक-निशानहो!
नव्य इतिहासशास्त्रकहता है कि किसी भी काल का सिर्फ एक इतिहासनहीं होता, बल्कि अनेक इतिहासहोते हैं। इस तरह एक तो होता है 'ऑफिशियल इतिहासजिसे विजेता लिखते हैं और एक होती है लोकस्मृति’; पब्लिक मेमरी, जिसे विजितअपनी लोकस्मृति’ ; पब्लिक मेमरी से अपना समांतर इतिहास लिखा करती है। इसलिए इतिहास में जो हुआ, उसे छिपाने दबाने से वे बातें दबती नहीं जो दबाई जाती हैं। वे पराजित का क्षुब्ध नेरेटिवबनकर लोकस्मृतिमें पड़ी रहती हैं और अनुकूल समय पाकर जग जाती हैं और फिर वे अपने तरीके सेऔर कई बार विद वेंजिएंस’ (प्रतिशोध के साथ) इतिहास को सीधा करने लगती हैं। हमें समझना होगा कि इतिहास सिर्फ प्रख्यात इतिहासकारनहीं लिखा करते, इतिहास में रहने वाली जनता अपनी लोककथाओं में, किस्सों में, अपना इतिहास लिखा करती है और कई बार वह अपने क्षोभ का इतिहास भी लिखा करती है। अगर अदालत ने रामललाको मंदिर की जमीन का कानूनी स्वामीमाना है, तो शायद इसीलिए कि रामललालोकस्मृति में विद्यमानहैं। इसके बरक्स, सेकुलर इतिहासकार जब रामकथा को कोरी कल्पनाया मिथकमानते हैं, तो वे वस्तुतः लोकस्मृतिकी अवमाननाही करते हैं।
याद रखें, ‘मंदिर आंदोलनके जरिये सिर्फ विश्व हिंदू परिषद-आडवाणी इतिहास नहीं लिख रहे थे, बल्कि अनंत राम भक्त भी अपनी स्मृति से इतिहास सिर्फ रच ही नहीं रहे थे, उसमें रह भी रहे थे। इसे नव्य इतिहासशास्त्रके नजरिए से ही समझा जा सकता है। समकालीन पंच परमेश्वरोंका फैसला इस मानी में चमत्कारी’; एकाध तत्ववादी समूह को छोड़ बाकी सभी दलों और आम जनता ने इसका तहेदिल से स्वागत किया है और शांति और भाईचारा बनाए रखने की अपील की है। इस प्रसंग में सबसे अधिक समझदारी व्यापकतम मुस्लिम समाज ने दिखाई है। वह फैसले से संतुष्टनजर आता है कि चलो बवाल कटा! फिर भी, कुछ बुद्धिजीवी बाल की खाल निकालने में अब भी लगे हैं। यों वे ऊपर से फैसले का स्वागत करते हैं, फिर किंतु-परंतु लगा कर कहते हैं कि यह बहुमत; यानी हिंदू का विजयवादहै, जबकि राम करुणावतारहैं और एक संतप्तनायक हैं। अगर यह बहुमत का विजयवादही होता, तो मस्जिद को पांच एकड़ जमीन देने की बात पर क्या कथित बहुमतवादी विलयवादीचुप रहते।
अपने बुद्धिजीवियों की समस्या यही है कि राम के नाम पर उन्हें वाल्मीकि-भवभूति तो याद आते हैं, तुलसीदास की रामचरित मानसभूले से भी याद नहीं आती। इसीलिए उनके लिए राम सिर्फ करुणाकरहैं, जबकि आम आदमी के लिए राम करुणा के सागरतो हैं ही, वे उसके परम पूज्यऔर आराध्य देवभी हैं। तुलसी के अनुसार कलियुग में मुक्ति के लिए उनका नाम स्मरणही काफी है। वे भगवान विष्णु के अवतार है। इस तरह, राम सिर्फ एक मूर्ति या मंदिर का नाम नहीं, बल्कि सामान्य से सामान्य हिंदू की आस्था के प्रतीक और केंद्र हैं।
न्यायविद् बराबर बता रहे हैं कि यह फैसला आस्थापर नहीं, ‘प्रमाणोंपर आधारित है। फिर भी कुछ बुद्धिजीवी इसे श्रद्धा और आस्थाका फैसला मानकर अस्मिताओं और आस्थाओं के भावी द्वंद्वों को खोलनेवाला समझते हैं, तो उनको यह भी समझ लेना चाहिए कि अगर  समाज में अस्मिताएंहैं; जो कि हैं, तो वे झगड़ेकी जगह बनेंगी ही। इसके बावजूद, आज अगर अदालत और कथित बहुमतवादीअस्मिता कहती है कि बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुध लेहुतब भी क्या आप उसका विश्वास नहीं करेंगे? अगर आप उस पर विश्वास नहीं करेंगे, तो आप पर कौन करेगा?
  

  जीवनी .

महात्मा गाँधी का हत्यारा

नाथूराम गोडसे

नाथूराम गोडसे का असली नाम रामप्रसाद था। नाथूराम गोडसे मराठी थे। नाथूराम गोडसे बचपन से ही एक लड़की की तरह पले बढ़े थे और बचपन से ही नाक में बाईं तरफ नथ पहनने के कारण घर वाले उन्हेँ नाथू राम पुकारने लगे थे। नाथूराम गोडसे को लड़कियों की तरह पाले जाने के बावजूद नाथूराम को शरीर बनाने, कसरत करने और तैरने का शौक़ था। नाथूराम बाल्यकाल से ही समाजसेवी थे । जब भी गाँव में गहरे कुएँ से खोए हुए बर्तन तलाशने होते या किसी बीमार को जल्द डॉक्टर के पास पहुँचाना होता तो नाथूराम को याद किया जाता था। पुणे से मराठी भाषा में अपना क्रान्तिकारी विचारों का हिन्दू राष्ट्र अखबार निकालने के पहले नाथूराम ने लकड़ी के काम में भी अपना हाथ आज़माया था।

नाथूराम विनायक गोडसे: 2

नाथूराम गोडसे ने न्यायालय के समक्ष गाँधी-वध के जो १५० कारण बताये थे उनमें से प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं: -

1. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (१९१९) से समस्त देशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के नायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाये। गाँधी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से स्पष्ठ मना कर दिया।
2. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गाँधी की ओर देख रहा था, कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचायें, किन्तु गाँधी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकार कर दिया।
3. ६ मई १९४६ को समाजवादी कार्यकर्ताओं को दिये गये अपने सम्बोधन में गाँधी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी।
4. मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए १९२१ में गाँधी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग १५०० हिन्दू मारे गये व २००० से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गाँधी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया।
5. १९२६ में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द की अब्दुल रशीद नामक मुस्लिम युवक ने हत्या कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप गाँधी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिये अहितकारी घोषित किया।
6. गाँधी ने अनेक अवसरों पर शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोबिन्द सिंह को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।
7. गाँधी ने जहाँ एक ओर कश्मीर के हिन्दू राजा हरि सिंह को कश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दू बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।
8. यह गाँधी ही थे जिन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।
9. कांग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिये बनी समिति (१९३१) ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गाँधी की जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।
10. कांग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गाँधी पट्टाभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहे थे, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पत्याग दिया।
11. लाहौर कांग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु गाँधी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।
12. १४-१५ १९४७ जून को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गाँधी ने वहाँ पहुँच कर प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।
13. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गाँधी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे; ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और १३ जनवरी १९४८ को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।
14. पाकिस्तान से आये विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली तो गाँधी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया।
15. २२ अक्तूबर १९४७ को पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउण्टबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को ५५ करोड़ रुपये की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल ने आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गाँधी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन शुरू कर दिया जिसके परिणामस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी।
16. जिन्ना की मांग थी कि पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान जाने में बहुत समय लगता है और हवाई जहाज से जाने की सभी की औकात नहीं| तो हमको बिलकुल बीच भारत से एक कोरिडोर बना कर दिया जाए.... जो लाहौर से ढाका जाता हो, दिल्ली के पास से जाता हो..... जिसकी चौड़ाई कम से कम १६ किलोमीटर हो....४. १० मील के दोनों और सिर्फ मुस्लिम बस्तियां ही बने|

 

 
 

 मिशन जनचेतना 

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