23 March 2019
Last Update: 2019-03-23 00:00:00
वर्ष-9,अंक-6,23मार्च2019

 

 

 

 

वर्ष-9,अंक-6,23मार्च2019/10चेत्र(ना.शा.)551.

 . आज का विचार-13 .

अनिच्छा के जन्म और नियन्त्रित जीवन के चलते भी पृथ्वी पर मानव जीवन के लिये अपार संभावनाएँ हैँ। प्रकृति उस पर मेहरबान है और उस ने मनुष्य को अमूल्य, असंख्य उपहारों से लाद रखा है। इन से वह अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने के साथ साथ जीवन मे रंग भी भर सकता है, इसे सुन्दर बना सकता है, इस का स्वाद ले सकता है। पृथ्वी है तो इतनी विविध कि देखने गिनने में एक आयु कम पड़ जाये। ऊपर से मिट्टी है, वह भी ठंडी परन्तु भीतर से गर्म तथा रंगीन और समाप्त जल मेँ होती है। अनेक परतों की इस संरचना की प्रत्येक परत के विशिष्ट गुण हैं और प्रत्येक की अपनी गाथा है। प्रकृति की इस अनूठी कृति पर बाहर से नीले आकाश का छत्र है जिस मेँ सूर्य़, चाँद, और असंख्य सितारे जड़े हुए हैँ। पृथ्वी के किसी भाग में धूप है तो कहीं छाया, कहीं दिन है तो कहीं रात, कहीं गर्मीं है तो कहीं सर्दी। कहीं से भी चलना शुरू कर दें, रास्ते विभिन्न रंगों, खुश्बू से महकते मिलते हैं और सफर की समाप्ति जल में ही होती है: जल जो जीवन का आवश्यकता भी है और संदेश भी.

भारत का इतिहास-34 .

यदि भारत का इतिहास वेदों से प्रारंभ करना है तो उन का काल निश्चित करना होगा। ऋग्वेद की रचना सब से पहले हुई परन्तु ऋग्वेद के काल निर्धारण में विद्वान एकमत नहीं है। सब से पहले मैक्स मूलर ने वेदों के काल निर्धारण का प्रयास किया। उसने बौद्ध धर्म (550 ईसा पूर्व) से पीछे की ओर चलते हुए वैदिक साहित्य के तीन ग्रंथों की रचना को  मनमाने ढंग से 200-200 वर्षों का समय दिया और इस तरह ऋग्वेद के रचना काल को 1200 ईसा पूर्व के करीब मान लिया। उसके समकालीन विद्वान डब्ल्यू. डी. ह्विटनी ने इसकी आलोचना की थी। उसके बाद मैक्स मूलर ने स्वीकार किया था कि "पृथ्वी पर कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो निश्चित रूप से बता सके कि वैदिक मंत्रों की  रचना 1000 ईसा पूर्व में हुई थी या कि 1500 ईसापूर्व में या 2000 या 3000 "। बाल गंगाधर तिलक ने ज्योतिषीय गणना करके इसका काल 6000 ई.पू. माना था। हरमौन जैकोबी ने जहाँ इसे 4500 ईसा पूर्व से 2500 ईसा पूर्व के बीच आंका था,  वहीं सुप्रसिद्ध संस्कृत विद्वान विंटरनित्ज़ ने इसे 3000 ईसापूर्व का  बताया था। आम तौर पर अधिकतर विद्वान वैदिक सभ्यता का काल २००० इस्वी ईसा पूर्व से ६०० ईसा पूर्व के बीच मे मानते थे, परन्तु नए पुरातत्त्व उत्खननो से मिले अवशेषों मे वैदिक सभ्यता के कई अवशेष मिले हैं जिस से आधुनिक विद्वान  जैसे डेविड फ्राले, तेलगिरी, बी बी लाल, एस र राव, सुभाष काक, अरविन्दो यह  मानने लगे है कि वैदिक सभ्यता भारत में ही शुरु हुई थी और ऋग्वेद का रचना काल ४०००-३००० ईसा पूर्व रहा होगा

इतिहासकारों का मानना है कि आर्य मुख्यतः उत्तरी भारत के मैदानी इलाकों रहते थे। इस काल में उत्तरी भारत मेँ पाकिस्तान, बांगला देश तथा नेपाल शामिल थे।

. इतिहास व संस्कृति .

23 मार्च का इतिहास:

1910 डॉ राममनोहर लोहिया का जन्म उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जनपद में हुआ था.

1931 भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान क्रांतिकारी भगत सिंह और उनके साथियों राजगुरु और

      सुखदेव को आज ही के दिन फांसी दी गई थी.

1956 पाकिस्तान दुनिया का पहला इस्लामिक गणतंत्र बना.

1965 नासा ने पहली बार जैमिनी 3 अंतरिक्ष यान से दो व्यकितयों को अंतरिक्ष में भेजा.

1976 मानव संसाधन मंत्री स्‍मृति ईरानी का जन्‍म नई दिल्‍ली में हुआ था.

1983 अमरीका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने स्ट्रैटेजिक डिफ़ेंस इनीशियेटिव या रणनीतिक रक्षा प्रबंध की

      घोषणा की.

1986 केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल में महिलाओं की पहली कंपनी को प्रशिक्षित किया गया.

1987 पश्चिमी जर्मनी के एक ब्रितानी सैनिक ठिकाने में हुए कार बम हमले में 31 लोग घायल हो गए

      हैं. विस्फोट इतना भयानक था कि सड़क पूरी तरह ध्वस्त हो गई और पास में खड़ी कारों को

      काफ़ी बुरी तरह नुक़सान पहुँचा.

1996 ताइवान में हुए पहला प्रत्यक्ष राष्ट्रपति चुनाव हुआ, ली टेंग हुई को बतौर राष्ट्रपति चुना गया.

2012 सचिन तेंदुलकर अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में 100 शतकों का कीर्तिमान बनाने वाले पहले क्रिकेटर बने.

शहीद भगत सिंह  

भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर, 1907 को लायलपुर ज़िले के बंगा में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है. सरदार भगतसिंह का नाम अमर शहीदों में सबसे प्रमुख रूप में लिया जाता है| उनका पैतृक गांव खट्कड़ कलाँ है जो पंजाब, भारत में है| उनके पिता का नाम किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था.

भारत के सबसे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद भगत सिंह भारत देश की महान ताकत है जिन्होंने हमें अपने देश पर मर मिटने की ताकत दी है और देश प्रेम क्या है ये बताया है. भगत सिंह जी को कभी भुलाया नहीं जा सकता उनके द्वारा किये गए त्याग को कोई माप नहीं सकता| उन्होंने अपनी मात्र 23 साल की उम्र में ही अपने देश के लिए अपने प्राण व अपना परिवार व अपनी युवावस्था की खुशियाँ न्योछावर कर दी ताकि आज हम लोग चैन से जी सके.

भारत की आजादी की लड़ाई के समय, भगत सिंह जीवनी सिख परिवार में जन्मे और सिख समुदाय का सीर गर्व से उंचा कर दिया.

भगत सिंह जी ने बचपन से ही अंग्रेजों के अत्याचार देखे थे, और उसी अत्याचार को देखते हुए उन्होने हम भारतीय लोगों के लिए इतना कर दिया की आज उनका नाम सुनहरे पन्नो में है.

उनका कहना था की देश के जवान देश के लिए कुछ भी कर सकते है देश का हुलिया बदल सकते है और देश को आजाद भी करा सकते है| भगत जी का जीवन भी संघर्ष से परिपूर्ण था.

भगत सिंह जी सिख थे और भगत सिंह जी के जन्म के समय उनके पिता सरदार किशन सिंह जी जेल में थे| भगत जी के घर का माहौल देश प्रेमी था| उनके चाचा जी श्री अजित सिंह जी स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्होंने भारतीय देशभक्ति एसोसिएशन भी बनाई थी| उनके साथ सैयद हैदर रजा भी थे.

भगता जी के चाचा जी के नाम 22 केस दर्ज थे, जिस कारण उन्हें इरान जाना पड़ा क्योंकि वहाँ वे बचे रहते अन्यथा पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर लेती.

भगत जी का दाखिला दयानंद एंग्लो वैदिक हाई स्कूल मैं कराया था.

सन् 1919 में जब जलियांवाला बाग़ हत्याकांड से भगत सिंह का खून खोल उठा और महात्मा गांधी जी द्वारा चलाये गए असहयोग आन्दोलन का उन्होंने पूरा साथ दिया.

भगत सिंह जी अंग्रेजों को कभी भी ललकार दिया करते थे जैसे की मानो वे अंग्रेजो को कभी भी लात मार कर भगा देते.

भगत जी ने महात्मा गांधी जी के कहने पर ब्रिटिश बुक्स को जला दिया करते थे| भगत जी की ये नटखट हरकते उनकी याद दिलाती है और इन्हें सुन कर, पढ कर आँखों में आंसू आ जाते है.

चौरी चौरा हुई हिंसात्मक गतिविधि पर गाँधी जी को मजबूरन असहयोग आन्दोलन बंद करना पडा, मगर भगत जी को ये बात हजम नहीं हुई उनका गुस्सा और भी उपर उठ गया और गाँधी जी का साथ छोड़ कर उन्होंने दूसरी पार्टी पकड़ ली.

लाहौर के नेशनल कॉलेज से BA कर रहे थे और उनकी मुलाकात सुखदेव, भगवती चरण और कुछ सेनानियों से हुई और आजादी की लड़ाई और भी तेज हो गयी, और फिर क्या था उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और आजादी के लिए लड़ाई में कूद पड़े.

उनकी शादी के लिए उनका परिवार सोच ही रहा था की भगत जी ने शादी के लिए मना कर दिया और कहा अगर आजादी से पहले मैं शादी करूँ तो मेरी दुल्हन मौत होगी.

भगत सिंह जीवनी : भगत जी कॉलेज में बहुत से नाटक आगि में भाग लिया करते थे वे बहुत अच्छे एक्टर भी थे| उनके नाटक में केवल देशभक्ति शामिल थी उन नाटको के चलते वे हमेशा नव युवकों को देश भक्ति के लिए प्रेरित किया करते थे और अंग्रेजों का मजाक भी बनाते थे और उन्हें निचा दिखाते थे.

क्योंकि अंग्रेजो का इरादा गलत था| भगत सिंह जी मस्तमौला इंसान थे और उन्हें लेक लिखने का बहुत शौक था| कॉलेज में उन्हें निबंध में भी कई पुरस्कार मिले थे.

भगत सिंह जी के परिवार के लोग जब हार गए की अब उन्हें भगत सिंह जी की शादी के लिए बाद में ही सोचना है और भगत सिंह जी को विश्वास हो गया की अब उनके परिवार वाले पीछे नहीं पड़ेंगे तभी वे वापस लाहौर आये और कीर्ति किसान पार्टी के लोगों से मेल जोल बढाने लगे और उनकी पत्रिका कीर्ति के लिए कार्य करने लगे.

वे इसके द्वारा देश के नौजवानों को अपने सन्देश देते थे| भगत जी एक बहुत बढ़िया लेखक भी थे, और वे पंजाबियो उदु समाचार पत्रों के लिए भी लिखा करते थे.

सन् 1926 मैं नौजवान भारत सभा मैं भगत सिंह को सेक्रेटरी बना दिया और इसके बाद सन् 1928 में उन्होने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) को ज्वाइन किया| ये चन्द्रशेखर आजाद ने बनाया था और पूरी पार्टी ने जुट कर 30 अक्टूबर 1928 को भारत में आये.

साइमन कमीशन का विरोध किया और उनके साथ लाला लाजपत राय भी थे साइमन वापस जाओ का नारा लगाते हुए, वे लोग लाहौर रेलवे स्टेशन पर ही खड़े रहे, उनके इस आन्दोलन से उन पर लाठी चार्ज किये गए और लाठी चार्ज होने लगा.

लाला जी बुरी तरह घायल हो गए और उनकी मृत्यु भी हो गयी| उनकी मृत्यु से देश की आजादी के लिए हो रहे आन्दोलन में और भी तेजी आ गयी.

भगत सिंह जी व उनकी पार्टी को बहुत जोर का झटका लगा और उन्होंने ठान लिया की अंग्रेजों को इसका जवाब देना होगा और लाला जी की मृत्यु के जिम्मेदार लोगों को मार डालेंगे| फिर क्या था उन्होंने अंग्रेजों को मारने का प्लान बनाया.

उन्हें पुलिस के ऑफिसर स्कॉट को मारना था मगर गलती से उन्होंने अस्सिस्टेंट पुलिस सौन्दर्स को मार डाला था| अपने आप को बचाने के लिए भगत सिंह तभी लाहौर चले गए.

अंग्रेजी पुलिस ने उन्हें पकड़ने के लिए चारों तरफ जाल भिछा दिए| भगत सिंह जी ने अपने आप को बचाने के पक्ष में बाल व् दाड़ी कटवा ली थी ताकि उन्हें कोई पहचान न पाए.

वैसे तो ये बाल व दाडी कटवाना सिख समुदाय के खिलाफ जाना था मगर भगत सिंह जी को देश के प्रेम के आगे कुछ और नहीं दिख रहा था.

भगत जी के साथ चन्द्रशेखर, राजदेव और सुखदेव ये सब मिल चुके थे और उन्होंने कुछ बड़ा धमाका करने की ठानी थी.

भगत सिंह जी का कहना था की अंग्रेज बेचारों के कान बहरे है और उन्हें ऊँचा सुनाई देता है जिसके लिए बाड़ा धमाका आवश्यक है.

8 अप्रैल सन् 1929 को भगत जी ने अपने साथी क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर ब्रिटिश सरकार की अस्सेम्बली में बम विस्फोट कर दिया उस बम से केवल आवाज ही होती थी और उसे केवल खाली स्थान पे फैउका गया ताकि किसी को हानि न पहुचे.

उन्होंने इन्कलाब जिंदाबाद के नारे लगाए और पर्चे बाटें और इसके बाद दोनों ने अपने आप को गिरफ्तार करवा लिया| वे चाहते तो भाग सकते थे मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया.

भगत सिंह जी ने ऐसा करके भारत के लोगों और अंग्रेजों को दिखाया की एक हिन्दुस्तानी क्या क्या कर सकता है, भगत सिंह अपने आपको शहीद बताया करते थे और उनके देश प्रेम को देख कर ये साबित हुआ की वे एक क्रांतिकारी है और उनकी मृत्यु पर वे मरेंगे नहीं बल्कि शहीद होंगे.

भगत सिंह, राजगुरु व् सुखदेव पर मुकदमा चला और जिसके बाद उन्हें फांसी की सजा सुनाई गयी, कोर्ट में भी उन तीनो ने इन्कलाब का नारा लागाया.

जेल में भगत सिंह जी ने बहुत सारी यातनाएं सही क्योंकि उस समय भारतीय कैदियों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता था न तो खाना अच्छा मिलता और न ही पहनने के लिए साफ सुथरे कपडे ये देख कर भगत जी ने जेल में ही रह कर आन्दोलन शुरू कर दिया.

अपनी मांग पूरी करवाने के लिए उन्होंने कई दिनों तक पानी नहीं पिया और खान भी नहीं खाया.

भगत जी को जेल में बहुत मारा जाता था और उनके गालियाँ भी दी जाती थी ताकि भगत जी हार मान जायें परन्तु उन्होंने अंतिम सांसों तक हार नहीं मानी थी.

भगत सिंह द्वारा लिखी गयी किताब – Biography of Bhagat Singh in Hindi Language

“Why I am Atheist” सन् 1930 में शहीद भगत सिंह जी ने किताब लिखी.

24 मार्च 1931 को फांसी दी जानी थी लेकिन देश के लोगों ने उनकी रिहाई के लिए प्रदर्शन किये थे जिसके चलते ब्रिटिश सरकार को डर लगा की अगर भगत जी को आजाद कर दिया तो वे ब्रिटिश सरकार को जिन्दा नहीं छोड़ेंगे इसलिए 23 मार्च 1931 को शाम 7 बजकर 33 मिनट पर जाने से पहले भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ रहे थे और उनसे पूछा गया की उनकी आखिरी इच्छा क्या है तो भगत सिंह जी ने कहा की मुझे किताब पूरी कर लेने दीजिये.

कहा जाता है की उन्हें जेल के आधिकारियों ने बताया की उनकी फांसी दी जानी है अभी के अभी तो भगत जी ने कहा की ठहरिये! पहले एक
क्रान्तिका दूसरे से मिल तो लेफिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले – ठीक है अब चलो

मरने का डर बिलकुल उनके मुख पे नहीं था डरने के वजह वे तीनो ख़ुशी से मस्ती में गाना गा रहे थे.

भगत सिंह, राजगुरु ,सुखदेव को फांसी दे दी गयी| ऐसा भी कहा जाता है की महात्मा गांधी चाहते तो भगत जी और उनके साथियों की फांसी रुक जाती, मगर गांधी जी ने फांसी नहीं रुकवाई.

फांसी के बाद कहीं आन्दोलन न भड़क जाए इस डर की वजह से अंग्रेजों ने पहले मृत शरीर के टुकड़े टुकड़े किये और बोरियों में भरकर फिरोजपुर की तरफ ले गए.

मृत शरीर को घी के बदले मिटटी किरोसिन के तेल से जलाने लगे और गाँव के लोगों ने जलती आग के पास आकर देखा तो अंग्रेज डर के भागने लगे और अंग्रेजों ने आधे जले हुए शरीर को सतलुज नदी में फैंक दिया और भाग गए.

गाँव वालों ने पास आकर शहीद भगत सिंह जी के टुकड़े को इकठ्ठा किया और अंतिम संस्कार किया.

लोगों ने अंग्रेजों के साथ साथ गांधी जी को भी भगत सिंह जी की मृत्यु का दोषी ठहराया और गांधी जी लाहौर के कांग्रेस अधिवेशन में हिस्सा लेने जा रहे थे तो लोगों ने काले झंडों के साथ गांधी जी का स्वागत किया और कई जगह तो गांधी जी पर हमला हुए और सादी वर्दी में उनके साथ चल रही पुलिस ने बचा लिया नहीं तो गाँधी जी को मार दिया जाता.

भगत सिंह जी ने जेल के दिनों में जो खत आदि लिखे थे उससे उनके सोच और विचार का पता चलता है| उनके अनुसार भाषाओं में आई हुई विशेषता जैसे की पंजाबी के लिए गुरुमुखी व् शाहमुखी तथा हिंदी अरबी जैसी अलग अलग भाषा की वजह से जाति और धर्म में आई दूरियाँ पर दुःख क्यक्त किया.

अगर कोई हिन्दू भी किसी कमजोर वर्गफ़ पर अत्याचार करता था तो वो भी उन्हें ऐसा लगता था जैसे कोई अंग्रेज हिन्दुओं पर अत्याचार करते है.

भगत सिंह जी को कई भाषाएँ आती थी और अंग्रेजी के अलावा बांगला भी आती थी जो उन्होंने बटुकेश्वर दत्त से सीखी थी| उनका विश्वास था की उनकी शहादत से भारतीय जनता और जागरूक हो जायेगी और भगत सिंह जी ने फांसी की खबर सुनने के बाद भी माफीनामा लिखने से मना कर दिया था.

उन्हें यह फ़िक्र है हरदम, नयी तर्ज़-ए- ज़फ़ा क्या है?
हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है?
दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख का क्या ग़िला करें।
सारा जहाँ अदू सही, आओ! मुक़ाबला करें।।

इन जोशीली पंक्तियों से उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है। चंद्रशेखर आजाद से पहली मुलाकात के समय जलती हुई मोमबती पर हाथ रखकर उन्होंने कसम खायी थी कि उनकी जिन्दगी देश पर ही कुर्बान होगी और उन्होंने अपनी वह कसम पूरी कर दिखायी। उन्हें भुलाये भी नहीं भुलाया जा सकता.

भगत सिंह जी के शहीद होने की ख़बर को लाहौर के दैनिक ट्रिब्यून तथा न्यूयॉर्क के एक पत्र डेली वर्कर ने छापा। उसके बाद कई मार्क्सवादी पत्रों में उन पर लेख छापे गए, पर क्योंकि भारत में उन दिनों मार्क्सवादी पत्रों के आने पर रोक लगी हुई थी इसलिए भारतीय बुद्धिजीवियों को इसकी ख़बर नहीं थी। देशभर में उनकी शहादत को याद किया गया.

आज भी भारत और पाकिस्तान की जनता भगत सिंह को आज़ादी के दीवाने के रूप में देखती है जिसने अपनी जवानी सहित सारी जिन्दगी देश के लिये समर्पित कर दी.

. न्यूज और व्यूज .

 
 

 मिशन जनचेतना 

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