ਲ਼ਬੁ ਪਾਪੁ ਦੁਇ ਰਾਜਾ ਮਹਤਾ ਕੂੜ ਹੋਆ ਸਿਕਦਾਰੁ॥
ਕਾਮੁ ਨੇਬੁ ਸਦਿ ਪੁਛੀਐ ਬਹਿ ਬਹਿ ਕਰੁ ਬੀਚਾਰੁ॥
ਅੰਧੀ ਰਯਤਿ ਗਿਆਨ ਵਿਹੂਣੀ ਭਾਹਿ ਭਰੇ ਮੁਰਦਾਰੁ॥
(
ਗੁ.ਗ੍ੰ.ਸਾ., ਅੰਕ : 468-69)

11/19/2018
ਸਾਲ 8,ਅੰਕ:218,19 ਨਵੰਬਰ 2018

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सत्य, निष्ठा व न्याय आधारित समाज हेतु

अज्ञानता विरूद्ध जन-जागर्ण आन्दोलन

मिशन जनचेतना

 संकलप .

मनुष्य की समस्याओं का का कारण उस की मूलत: बहुपक्षीय और सर्व-व्यापत अज्ञानता है। विचार विमर्श शून्य, परिणामों से उदासीन कार्य करने की प्रवृति के चलते उस का व्यावहार अनेक समस्याएँ पैदा करता है। स्वार्थवश वह अन्य से लड़ता झगड़ता है, उन के लिये समस्याऐं पैदा करता है, अपनी बर्बादी को आमंत्रित करता है। सुखी, सुरक्षित जीवन हेतु आवश्यक है कि वह प्रत्येक कार्य सोच विचार कर करे। उसे जीवन, उस की समस्याओँ का वास्तविक ज्ञान हो, उन का सामना करने का सामार्थय और साहस हो। उस को ऐसा बनाने के लिए सत्य, निष्ठा व न्याय आधारित सदभावनापूर्वक सहयोगी समाज की आवश्यक्ता होती है। ऐसे सामाज के सृजन हेतु एक-सामान विचारों के महानुभावों को संगठित हो कर व्यापक, सर्व-कालिक आंदोलन करने की आवश्य़क्ता है।

  एक बेबस प्राणी .

मानव जीवन का यह कठोर सत्य है कि उस का अपने जन्म और जीवनयापन पर नियन्त्रण नहीं होता। हस का जन्म माँ-बाप की भावनात्मक आवश्यकताओं की पूर्ती व भविष्य की योजना का नतीजा होता है। अपने पालन पौषण में भी उस का इच्छा का महत्व नहीँ रहता। परिवारक संस्क्रति, संसाधनों की उपल्बता और तत्कालीन सामाजिक मूल्य उस की परवरिश को मुख्य कारक होते हैं। बालग होने पर उस ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ती हेतु सामाजिक नियमों की पालना करते हुए सखत परिश्रम करना होता है। समाज तो उसे स्वैइच्छा से आत्मघात की आज्ञा भी नहीं देता। ऐसा करने के प्रयास में भी दण्ड का प्रावधान है। संक्षिपत शब्दों में मनुष्य विभिन्न स्थितियों में समाज की एक व दूसरी शक्ति के इशारों पर नाचने वाला बेबस प्राणी है जो जन्म से मरने तक जन हित साधने को अभिशप्त है।

  एक ही विकल्प . 

समाजिक शक्तियों के गुलाम मनुष्य के पास, पराधीनतायुक्त ही सही, जीने का कोई विकल्प नहीं है। जीना उस की मजबूरी है। अब जब जीना ही है तो क्यों ना आन्नदपूर्वक, सार्थक जीवन जीने का प्रयत्न किया जाए? इस शब्दों में प्रत्येक मनुष्य की व्यक्तिगत पसंद, नापसंद सम्मिलित रहती है। इन में से अनेक की समाज स्वीकृति नहीँ देता। उल्लंघन करने वालोँ के लिए दण्ड का प्रावधान है और बदनामी भी होती है।   समाज का अभिन्न अंग होने के कारण समाजिक नियमों की अवहेलना करनी बी नहीँ चाहिए। किसी भी समाज में एक ही प्रयास से वाँछित परिवर्तन संभव भी नहीँ होता, यह तो धीरे धीरे ही बदलता है। इस लिये किसी तत्कालीन परिवर्तन के प्रयत्न सफल नहीँ होते। निर्धारित सीमां रेखा में जीवन का मन इच्छित आन्नद, अवश्य, प्राप्त किया जा सकता है। मजबूरी में ही सही, बुद्धिमता तो ऐसी जीवन शैली अपनाने नें ही है जो अधिकत्म आन्नद भी दे और समाज के विकास में योगदान भी करे। यह तभी संभव है यदि मनुष्य चेतन हो और अपने पास-पड़ोस तथा मानवता की भलाई में स्वंय की भलाई माने। ऐसा उस की न्यूनत्म आवश्कताऐं पूरी होने पर ही संभव है।

  मनुष्य और समाज .

इच्छा हो, ना हो, जीवन जीने, इस की आवश्यताओं की पूर्ति हेतु समाज से तो जुड़ना ही होगा। जन्म के समय मनुष्य श्वास लेता मास का टुकड़ा मात्र ही होता है। यदि उस का परिवार, समाज की ही एक इकाई, उस का लालन पालन ना करे तो शायद वह जीवित भी ना बचे। पशुओं की भाँति यदि जीवित रह भी जाए, तो खाने, पीने, रहने हेतु तो उसे समाज की आवश्यकता रहेगी ही। यदि समाज में रहना ही है, तब क्यों ना ऐसे समाज का निर्माण किया जाए जो प्रत्येक का ध्यान रखे, दुख सुख में सहाय़ता करे और इच्छा से जीने में बाधा भी ना बने। परन्तु ऐसा तभी संभव है यदि हम सभी समाजिक बने, इस में दिलचस्पी लें, सम्बन्धित कार्यों में सक्रिय हों।

  मनुष्य की न्यूनतम आवश्यक्ताएँ . 

पदार्थक स्तर पर खाना, वस्त्र और गृहस्थान मानव जीवन की न्यूनतम आवश्यक्ताएँ मानी जाती हैं। खाना शरीर को काम करने के लिए ऊर्जा प्रदान करता है। खाना खाए बगैर शरीर अधिक समय तक जिन्दा नहीं रह पाता। वस्त्रों की आवश्यक्ता शरीर की प्रतिकूल मौसम व मक्खी, मच्छर जैसे कष्टकारी कीटों से रक्षा हेतु पड़ती है। उपयुक्त गृहस्थान मनुष्य को व्यक्तिगत स्वतंत्रता, शारीरक आराम और शत्रु से सुरक्षा हेतु आवश्यक होता है। इसी लिये स्वस्थ्य जीवन हेतु संतुलित भोजन, सुविधाजनक वस्त्रों और शांत व हवादार स्थान की सिफारिश की जाती है। क्यूँकि यह सभी मनुष्य को जिन्दा रहने के लिए आवश्यक हैं, इस लिए इन का व्यवस्था समाज को बिना किसी भेद भाव करनी चाहिए। ऐसा ना होने का सरल अर्थ बेइंसाफी तथा मानव अधिकारों का उलंघन करना है।

 

  न्यूनतम आवश्यक्ताएँ . 

 और मौलिक अधिकार . 

न्यूनतम आवश्यक्ताओं की पूर्ति के अभाव में मनुष्य विभिन्न रोगों से ग्रस्त जाता है। कुपोष्ण का शिकार बालक जीवन को बोझ की तरह ढोते हैं। कमजोर शरीर, मुरझाए चेहरे लिए यह मनुष्य जीवन की खूबसूरती व प्रत्येक खुशी से वंचित रहते हैं। अपनी और अपने ऊपर निर्भर व्यक्तियों की आवश्यक्ताएँ पूरी ना कर पाने का दुख उन्हें परेशान किए रहता है। कई आत्महत्या की ओर अग्रसर होने को विवश हो  जाते हैँ। अधिक निराश आतंकवाद के पथ पर समस्त मानवता की खुशियाँ छीनने लगते हैं।

इस समस्या का एकमात्र समाधान मनुष्य की न्यूनतम आवश्यक्ताओं को उस का मौलिक अधिकार बनाना है। इन की पूर्ति समाज का ही ध्येय होना चाहिए। जो जन्म ले, उसे खाने, वस्त्र और गृहस्थान की चिंता नहीं ही होनी चाहिए।

  तार्किक मांग .

समाज द्वारा मनुष्य की न्यूनतम आवश्यक्ताओं की पूर्ति करना कानूनी, नैतिक और भावनात्मक सभी पक्षों से अनिवार्य है। काम करते समय यदि हम से कोई दुर्घटना हे जाए तो कानून उस की पूर्ति का दण्ड देता है। मनुष्य का जन्म भी जाने, अन्जाने में समाज (माँ-बाप) द्वारा घटित दुर्घटना ही है। जन्म लेने वाले की इस में सहमति नहीं होती और ना ही कोई और भूमिका होती है। वह बेकसूर को तो पूरी आयु संघर्ष करने को अभिश्प्त होता है। समाज का नैतिक दायतव्य बनता है कि वह उस के कारण किए जा रहे संघर्ष में योगदान करे। और कुछ नहीं तो उस के जीवित रहने के लिए न्यूनतम आवश्यक्ताएँ ही जुटा दें। कानूंन के पक्ष से भी हम ऐसा करने को बाध्य हैं क्योंकि दुर्घटना हम से हुई है, जन्म के जिम्मेदार हम ही हैं। व्यव्यासक दलीलों को छोड़ भी दें तो भावनात्मक पक्ष से भी यह हमारे ही बच्चे हैं। हमारे ही वंश को इन्होंने आगे चलाना है। हमारे रीति रिवाजों, परंपरा को इन्हों ने ही जिंदा रखना है। हम क्यों इन्हें रोजी रोटी का चक्र में उलझाए हुए हैं ? ब्रहमण्ड में मात्र मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो कमा कर खाने को विवश है। आन्य सभी प्राकृति का ही खाते हैं। मनुष्य के करने को और बहुत कुछ है। उसे हमें खाने, वस्त्र और गृहस्थान आदि के संघर्ष से आजाद कर देना चाहिए।

  मान-सम्मान .

मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति को उस का मौलिक अधिकार मानने का विचार नया नहीं है। मानव संस्कृति के प्रत्येक पड़ाव पर कोई ना कोई गौतम अवश्य हुआ है जिस ने बेकसूर, समय की चक्की में पिस रहे मनुश्य की पीड़ा को महसूस किया और इस को विरूद्ध आवाज ऊठाई। जन्म से मरने तक मनुष्य प्रतिदिन किसी नई मुसीबत से घिरा रहता है।

जीने के लिए आवश्यक्ताएँ बहुत कम होती हैं परन्तु सभ्य दिखने के लालच ने उन्हें असीमित लिया गया है और प्रत्येक की पूर्ति के लिये अनेक पापड़ बेलने पड़ते हैं। ऐसा करते समय कुछ तो महलों के स्वामी बन जाते हैं जब कि अन्य पेट भरने के योग्य भी नहीं रहते।

दरिद्रों प्रति दया, हमदर्दी, करूणा की भावनाओं से दान की शुरूआत हुई। पेट भरने और नंगेज ढांपने हेतु गरीब दानियों के दर पर जाने लगे। उन्होंने भूखों को खाना खिलाने तथा नंगों को वस्त्र देने में देरी नहीं की। दान पुन्न से उन की ख्याति को चार चाँद लगते थे, आदर मान में वृद्धि होती थी परन्तु मांगना तो अनेक दुष्कर्मों का कारण होता है। दानियों की तो स्दैव उस्तति ही हुई है परन्तु भिखारी को किसी ने अच्छा नहीँ कहा, उस की निंदा ही हुई है।

मनुष्य के मान सम्मान के लिए आवश्यक है कि उस की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति को उस का मौलिक अधिकार मान लिया जाए।

  मेहरबान प्रकृति .

अनिच्छा के जन्म और नियन्त्रित जीवन के चलते भी पृथ्वी पर मानव जीवन के लिये अपार संभावनाएँ हैँ। प्रकृति उस पर मेहरबान है और उस ने मनुष्य को अमूल्य, असंख्य उपहारों से लाद रखा है। इन से वह अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने के साथ साथ जीवन मे रंग भी भर सकता है, इसे सुन्दर बना सकता है, इस का स्वाद ले सकता है परन्तु इस के लिये उस के नियमों का पालन करना आवश्यक् है। वह अनुशासन प्रिय है, अपने नियमों की द्रढ़ता से पालना करती है और दूसरों से भी ऐसा करने की आशा करती है। जो ऐसा नहीं करते, उन से नाराज़ ही नहीं होती, दण्डित करने में भी द़ृढ़ रहती है। अपने साथ छेड़छाड़ तो कदाचित सहन नहीं करती। आँधी, तूफान, सूखा, वर्षा, बाढ़, ओलावृष्टि, भूकंप, सुनामी उस की नाराज़गी के चिन्ह ही तो हैं। वर्तमान में मौसम में अनिश्यचता और प्रकृतिक आफतों में बढ़ोतरी प्रकृतिक अभिवृति में परिवर्तन के संकेत हैं। प्रकृति की इच्छा है कि कोई उस से छेड़छाड़ ना करे, सभी उस के विधान को समझें, हस की पालना करें। नहीं तो, आज नहीं तो कल, उस की कृपा से वंचित हो जाऐंगे। विज्ञान की भाषा में मनुष्य को प्रकृति का संतुलन से छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए।

  पृथवी .

पृथ्वी है तो इतनी विविध कि देखने गिनने में एक आयु कम पड़ जाये। ऊपर से मिट्टी है, वह भी ठंडी परन्तु भीतर से गर्म तथा रंगीन और समाप्त जल मेँ होती है। अनेक परतों की इस संरचना की प्रत्येक परत के विशिष्ट गुण हैं और प्रत्येक की अपनी गाथा है। प्रकृति की इस अनूठी कृति पर बाहर से नीले आकाश का छत्र है जिस मेँ सूर्य़, चाँद, और असंख्य सितारे जड़े हुए हैँ। पृथ्वी के किसी भाग में धूप है तो कहीं छाया, कहीं दिन है तो कहीं रात, कहीं गर्मीं है तो कहीं सर्दी। कहीं से भी चलना शुरू कर दें, रास्ते विभिन्न रंगों, खुश्बू से महकते मिलते हैं और सफर की समाप्ति जल में ही होती है: जल जो जीवन का आवश्यकता भी है और संदेश भी।

  पौष्टिक खाना .

पृथ्वी का अधिक भाग स्वादिष्ट व शक्तिवर्धक फलों, फूलों से भरा हुआ है। प्रत्येक प्रकार के जीव-जन्तु, पशु-पंछी, कीड़े-मकोड़े यहां के समाप्त ना होने वाले खाने से अपना पेट भरते रहे हैं, भर सकते हैँ। इस की मिट्टी में भी एक दाने से अनेक दाने पैदा करने की अचम्भित क्षमता है। पृथ्वी के विभिन्न खण्डों में विभिन्न प्रकार की मिट्टी है जो विभिन्न वस्तुओं को पैदा करने के सक्षम होती है। मनुष्य ने इन से अधिकतम पैदावार लेने की क्षमता प्राप्त कर ली है परन्तु खेती को व्यापार बनाने के घातक परिणाम निकले हैँ। अधिक फसलें लेने से भूमि की उदपादिकता कम हुई है। रासायणिक उर्वरकों के उपयोग से खाने की पौष्टिकता तो कम ङुई ही है, कई स्थानों पर विषैली भी हुई है।

  हमारे वस्त्र .

पहले मनुष्य को, अन्य जानवरों की भाँति, वस्त्रों की आवश्यक्ता नहीं होती थी। उस की मोटी चमड़ी घने बालों से भरी हुई थी और गर्मी, सर्दी व अन्य से उस की रक्षा करने में सक्षम थी। यूँ भी मनुष्य खब्बल घास, जो प्रत्येक स्थिति से समायोजन कर लेता है, की प्रवृति का स्वामी है। समय के साथ शरीर की दशा में परिवर्तन हुआ और मनुष्य को गर्मी सर्दी महसूस होने लगी तो शरीर को ढाँपने की आवश्यक्ता पड़ी। यह डेढ लाख वर्ष पूर्व की बात है। कहा जाता है कि पहले उस ने जानवरों की खाल पहनी। कृषि में उस ने कपास की खेती करनी सीखी, रूई से कातना प्रारंभ हुआ। सूत से बुनाई होने लगी। दूसरी ओर विशेष जानवरों के बालों से ऊन का अविष्कार हुआ। आज, वस्त्र हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं, विवधता में उपलब्ध हैं और हम अपनी आवश्यकता और रूचिनुसार पहनने को स्वतंत्र हैँ।

  मजबूत, हवादार भवन .

घने जंगल, पर्वतों की गुफाएँ आदि मानव के शरणस्थल थे। विशालकाय वृक्ष की डाल, संकीर्ण गुफाएँ उस का अस्थाई घर थे। दिन भर की भाग दौड़ के पश्चात वह यहां पहुँच कर विश्राम करता। वर्षा ने उसे वृक्ष की डालियों को एक दूसरे से बांधना सिखाया। यह 30 हजार वर्ष पूर्व की बात है। इसी से घर बनने प्रारंभ हुए। लकड़ी के साथ पत्थरों का प्रयोग किया जाने लगा। मिट्टी दरारों को भरने और पत्थरों को जोड़ने के काम लाई जाने लगी। पत्थरोँ से सीमिंट बना, फिर लोहे का आविष्कार हुआ। आज हम बड़े और सुविधाजनक भवन बनाने और उन में रहने लगे हैं। ऐसा प्रकृति द्वारा उपलब्ध किये गए पदार्थों से ही संभव होता है परन्तु हम उस की उपेक्षा किए रहते हैं। इस का परिणाम घातक होता है। भवन टूटते हैं तो जान माल की भारी क्षति होती है।

 

  संभावनाओं का अन्वेषण .

सुविधाजनक जीवन की इच्छा से मनुष्य ने संभावनाओं का अन्वेषण प्रारंभ किया। उस के पास पड़ोस में प्रकृति थी- स्मृद्ध भी, मनभावन भी। वही मनुष्य का प्रथम निशाना बनी। उस की सम्पति का कोई छोर तो था नहीं। सभी पेट भर कर भी खाते रहते तो भी समाप्त नहीं होती। समुदाय में बाँटने का झंझट नहीं होता। आवश्यक्ता ही मापदण्ड होती है परन्तु असुरक्षा से कुण्ठित मनुष्य ने व्यक्ति को समुदाय पर अधिमान दिया। सम्पति को बाँटने का आदर्श ढंग बराबर बाँटना है परन्तु इस के लिये संमति नहीं बनी। प्रत्येक अपने लिये अधिक से अधिक और बढ़िया से बढ़िया चाहता था। इस लिये समतक बाँट की अपेक्षा लूट पाट शुरू हो गई। अधिक शक्तिशाली अधिक भी ले गए और बढ़िया भी। कम शक्तिशाली को कम गुणवता का कम मात्रा में मिला और जो निर्बल थे, वह देखते ही रह गए। निर्बल को सामर्थ्य की सेवा कर के भी अवशेष ही उपलब्ध होता है। आदि काल से मानव जीवन में अनेक परिवर्तन हुए परन्तु संसाधनो के बाँटने की विधि वैसे की वैसी है। वर्तमान सभ्य जनतंत्र व्यवस्था में भी मानवता उच्य, मध्य व निम्न वर्गों में बंटी हुई है। समानता कहीं दूर दूर तक दिखाई नहीं देती।

  विभाजित मानवता .

मानवता को रंग, नसल, लिंग, जाति, धर्म आदि के नाम पर विभाजित करने का प्रयास निरंतर जारी है पृथ्वी को भी विभिन्न राष्ट्रों, देशों, प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया है प्रत्येक ने अपनी अपनी सीमाएँ निर्धारित कर ली हैं और उन की रक्षा को नाम पर विनाशकारी हथियारों से लैस सेनाएँ तैनात कर दी हैंअपने नागरिकों में देशभक्ति की भावना को बलवती करने हेतु भरसक प्रयास किए जाते हैं- अपने देश, कौम, राष्ट्र को सर्वोतम प्रमाणित करने के लिए अपनी संस्कृति को प्राचीनतम और सभ्याचार को श्रेष्ठ बताया जाता है तथा अपने पूर्वजों के शौर्य के गीत गाए जाते हैंअन्य, विशेषकर पड़ोसी, देशों के लिए घृणा पैदा कर के उन से युद्ध किये जाते हैं। पूर्व में भी, विजेताओं ने पराजित को लूटा है, गुलाम बनाया है। बीसवीं शताब्दी में समस्त विश्व दो महां युद्धों में धकेला गया। तीसरे युद्ध की तैयारी हो रही है।

यही नहीं, विश्व के प्रत्येक देश में नागरिक विभिन्न समूहों में विभाजत हैं और मरने मारने को तैयार बैठे हैं।

देश में कलह, विदेश से युद्ध !

क्या कहने !!

परन्तु कयों ? किस लिए ??

  पर्यावरण प्रदूषण .

मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिये पर्यावरण की चिंता भी नहीं की। अधिक्तर पशुओं को घरेलू बना लिय़ा है। जंगल के पेड़ों को काट कर लकड़ी का सामान बना लिया है अथवा ईधन में जला दिया है। प्राप्त भूमि पर खेती कर ली है। पर्वतों की सड़कें बनाने अथवा रेल की पटऱी बिछाने हेतु कटाई कर दी गई है।  पर्यटकों के भ्रमणस्थल विकसित करने के लिये होटल, रेस्तराँ और सराय आदि के आकाश छूते भवन निर्मित किये गये हैं। बहती नदियों पर बाँध बना लिये गये हैं और उन की जल-धारा को कृत्म नाले, खालों में डाल दिया गया है। और तो और, भारत सरकार देश की नदियों को एक दूसरे से जोड़ने को उत्सुकता दिखा रही है।

पर्यावरण से यह खेल क्यों?

  अनुशासित प्रकृति .

प्रकृति यूँ तो मनुष्य पर मेहरबान रहती है; मानव जीवन का आधार प्रकृति की कृपा ही है परन्तु वह अपने नियमों की सखती से पालना करती है और दूसरों से भी ऐसा करने की आशा करती है। जो ऐसा नहीं करते, उन से नाराज़ ही नहीं होती, दण्डित करने में भी द़ृढ़ रहती है। अपने साथ छेड़छाड़ तो कदाचित सहन नहीं करती। आँधी, तूफान, सूखा, वर्षा, बाढ़, ओलावृष्टि, भूकंप, सुनामी उस की नाराज़गी के चिन्ह ही तो हैं। वर्तमान में मौसम में अनिश्यचता और प्रकृतिक आफतों में बढ़ोतरी प्रकृतिक अभिवृति में परिवर्तन के संकेत हैं। प्रकृति की इच्छा है कि कोई उस से छेड़छाड़ ना करे, सभी उस के विधान को समझें, हस की पालना करें। नहीं तो, आज नहीं तो कल, उस की कृपा से वंचित हो जाऐंगे। विज्ञान की भाषा में मनुष्य को प्रकृति का संतुलन से छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए।

  प्रकृति की अवमानना .

हम मे से कोई भी प्रकृति को नाराज़ नहीं करना चाहता परन्तु ऐसा भी कोई नहीं जो उस को दुखी ना करता हो। गृहस्थी बसाने हेतु हम घर बनाते हैं। भूमि के एक खण्ड पर ईटों, सीमेंट, रेता, लोहा, बजरी, लकड़ी के उपयोग से भवन का निर्माण हो जाता है, परिवार सुख शाँति से रहने भी लग जाता है परन्तु किसी को भूमि के उस भाग का स्मरण नहीं होता जिस की मिट्टी को पका कर ईटें तैयार की गईँ थीं। भूमि के उस खण्ड की कोई सार नहीं लेता जिस के पत्थरों को पीस कर सीमेंट बनाया गया। जिस नहर, नदी से रेता निकाली गई, उस का दर्द किसी को नहीं हुआ। वृक्षों को काट कर दरवाजा, खिड़कियाँ तो बना लिए परन्तु इस से वीरान हुई भूमि किसी को दिखाई नहीँ दी। मकान बनने से मौहल्ला बन गया, हज़ारों प्राणी साँस लेने वाले हो गए, आकसीजन खाएँगे, कार्बन डाईआकसाईड छोड़ेंगे परन्तु किसी के यहाँ कार्बन डाईआकसाईड खा कर आकसीजन छोड़ने वाले वृक्षों, पौधों के लिए स्थान नहीं. वास्तव में हम ने प्रकृति से लेना ही सीखा है, देना हमारी आदत नहीं।

  आकाश व सागर का विजई .

मनुष्य ने ब्रह्माण्ड की अन्य शक्तियों का स्वामी बनने के लिये कड़ी मेहनत की हैप्रकृति के जटिल सूक्षम नियमों को समझा और उन्हें उपयोग में ला कर अपने सुख सुविधा की विभिन्न वस्तुओं का निर्माण कर लियापरिणामत: उस ने आकाश में उड़ना सीख लिय़ा हैआज वह चंद्रमा तक पहुँच गया है और वहां पर बस्तियाँ बनाने की तैयारियों में जुटा है मंगल पर कब्ज़ा उस का अगला निशाना हैऐसे ही वह सागर तैरना जान गया हैअनेक व्यक्ति एक समुन्दर से दूसरे तक पहुँचने में सफल रहे हैंवहां पहुँच कर स्थानीय नागरिकों को पराजित कर वह स्तासीन भी हुआ हैनौका तो अब बीते समय की बात हो गयी हैसागर के सीने में छेद कर, उस में से बेशकीमती वस्तुएँ निकाल लाने का सामर्थ्य रखने वाली पनडुबियाँ उस के पास हैं परन्तु सागर, आकाश के इस विजेता को अभी सलीके से पृथ्वी पर चलना नहीं आया।

  मुश्किलोँ का स्रोत .

मनुष्य सड़क पर चलता है तो दुर्घटना का कारण बनता हैघर पहुँचता है तो उसे प्रियतम और वस्तुओ का अभाव कचोटता हैआज्ञाकारी व्यक्ति ही उस को प्रिय होता है और विश्व की प्रत्येक वस्तु का स्वामी होना चाहता है स्वंय की सुविधा के लिये वह अन्य को असुविधा में डालता हैअपने घर की गंदगी दूसरों के यहाँ डालने में उसे कोई झिझक नहीँ होतीलेन देन में वह लोभी लालची रहता है और  लाभार्थ दूसरों को बाँटने को नीति मानता है अपने से बलवान की चापलूसी और कमज़ोर पर धौंस में उसे आनंद मिलता हैआदि काल से अब तक उस ने अनेक हत्य़ाएँ की हैं, उन की आशाऐं भंग की हैं, उमीदें तोड़ी हैं परन्तु सभी का कल्याण करने योग्य समाज के सृजन की चेष्टा नहीं की अपितु ऐसा करने  करने करने वालों के लिये बाधाएँ खड़ी की हैं, उन्हें बदनाम किया है, बर्बाद करने में कोई कमी नहीं छोड़ी है

  जियो और जीने दो ! .

यद्धपि आज का जनतंत्र जन का, जन में से, जन के लिय़े तंत्र की परिभषा का भली भाँति अनुसर्ण नहीँ करता है, तो भी समान मूल्य़ के मताधिकार के चलते मानव अधिकारों प्रति चेतना में असाधारन वृदि हुई है और वह समय अधिक दूर नहीं जब एक मनुष्य दूसरे की गुलामी करने से इन्कार कर देगा बल्कि अपने अधिकार मांगेगा। तब हमें जियो और जीने दो का सिद्धाँत अपनाना पड़ेगा। अच्छा हो यदि हम बगावत होने से पूर्व ही इसे अपनी जीवन शैली में संम्मिलित कर लें। मनुष्य को लिये जीवन बोझ तो नहीँ ही बनना चाहिये। इच्छाएँ और उन की पूर्ति हेतु उठाए गए पग व्यक्ति के लिये खुशी, संतुष्टि देने वाले और समाज की प्रगति के श्रोत बनने चाहियें। जीवन तभी सार्थक हो पाएगा।

  संसाधनोँ की बंदर-बांट .

एक मनुष्य का दूसरे से वास्तव झंझट संसाधनों के अन्यायकारी वितरण का है। प्रकृति सभी की है। उस पर प्रत्येक का एक समान अधिकार है। वायु, जल, मिट्टी, धूप, छाँव, वन, पर्वत हमें विरासत में प्राप्त हुए हैँ। इन पर किसी एक का अधिकार नहीँ होना चाहिये। यह सार्वजनिक संपति है जिस का लाभ सभी को एक समान मिले। इसी प्रकार प्राकृतिक वस्तुओं और सेवाओं से प्राप्त लाभ का वितरण भी एक समान होना अनिवार्य है। प्रत्येक मनुष्य की न्यूनतम आवश्यक्ताओं की पूर्ति यहीं से हो और शेष का वितर्ण कामगार द्वारा उपलब्ध की गई सेवानुसार हो। आज की स्थिति बाहुबलियों द्वारा लूट पाट की है। प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य का कब्ज़ा है। उत्पादन की आय का बड़ा भाग पूंजीपतियों की तिजोरियों में बंद है। भूखा, अभावग्रस्त मनुष्य संपन, जमांखोर के विरूद्ध रंजिश तो रखेगा ही और जब भी अवसर मिलेगा, छीनने का प्रयास भी करेगा। इसी लिये उस ने स्वंय को जातियोँ, जमातों में संगठित कर लिया है।

  संयुक्त और स्थाई संस्था .

मानव जीवन के प्रारंभ से ही अनेक विद्धानों, समाज सुधारकोँ और धार्मिक नेताओं ने, समय समय पर मनुष्य को संसाधनों पर बलपूर्वक कब्ज़ा करने से रोकने के प्रयास किये हैं। अधिकतर ने धन दौलत को मृत्यु पश्चात यहीं छूट जाने वाली माया की संज्ञा दी है। मनुष्य को एक ही ईश्वर की संतान कहने में भी यही भावना कार्यरत थी। इसी लिये महापुरूषों ने शाँतिपूर्वक, सामुदायिक सौहार्दय से रहने की शिक्षा दी और विलक्षण जीवन-शैली को अपनाने पर बल दिया। विभिन्न धर्मों, विचारधाराओं का विकास इसी लिये, इसी प्रकार हुआ। महापुरूषों के कठिन परिश्रम के सार्थक परिणाम भी मिले परन्तु कुछ अंतरताल पश्चात, जैसे ही महापुरूष का प्रभाव क्षीण हुआ, मनुष्य पहले जैसा ही हो जाता रहा। इस से यह निष्कर्ष भी निकलता है कि मनुष्य को एक संयुक्त और स्थाई संस्था की आवश्यक्ता है जो उस के सार्थक जीवन में बाधक समस्याओं के वास्तविक तथा वैज्ञानिक कारण मालूम करे, उन का समाधान ढूंढे और प्रत्येक को उन से निरन्तर अवगत रखे। मिशन जनचेतना का आधार इसी आशय की पूर्ति है।

मिशन चनचेतना-II

मनुष्य के सार्थक जीवन की समस्याओं के वास्तविक और वैज्ञानिक कारणों के ज्ञान, उन के मानवीय समाघान व उन से सभी को निरंतर अवगत कराने हेतु एक स्थाई संस्था की आवश्यक्ता की पूर्ति हेतु मिशन जनचेतना की स्थापना की गई है। मिशन जनचेतना अज्ञानता विरूद्ध विश्व-व्याप्त, स्र्वकालिक आंदोलन है जिस के मंतव्य नागरिकों से उन की समस्याओं, उन के वास्तविक कारणों तथा वैज्ञानिक समाधान साँझा करना है। इस की स्थापना 16 अक्टूबर, 2001 को चार मुद्दों के आधार पर की गई-

(1)    जन साधारण को ज्ञात हो कि उस की वास्तविक समस्याएँ कौन सी हैं, वह पैदा क्यों होती हैं और उत का समाधान क्या है।

(2)    विश्व के समविचार्कोँ को जनसाधारण की मूलभूत आवश्यक्ताओं की पूर्ति, शांतमय़ सहअस्तित्व, संसाधनों की न्यायौचित बांट और सभी को विकास के एक समान अवसर उपलब्ध कराने हेतु जत्थेबंध किया जाए।

(3)    स्थापित प्रबंधकीय, राजनैतिक, वित्तीय व धार्मिक शक्तियों के पीड़ितों की सहायता की जाए तथा

(4)    समाज के अभावग्रस्त वर्गों को समृद्ध जनों को उपलब्ध सहूलतों का स्वामी बनाने के प्रयत्न किए जाएँ।

इन को क्रमश: चेतना (Awareness), जत्थेबंदी (Consolidation),  सहयोग (Stand by)  और सहायता (Assistance) का नाम दिया गया है।

  चेतना .

गुरू नानक देव जी जैसे महान विद्वानों और चिंतकों की स्पष्ट मान्यता है कि मनुष्य की समस्याएँ उस की अज्ञानता के कारण पैदा होती हैं। हम प्रत्येक कार्य़ विचार विमर्श विहीन, कार्य- कारण सम्बंध स्थापित किए बिना, गैरयोजना क्रम से करने के अभ्यस्त हैं। इस का परिणाम दुखों, तकलीफों भरपूर असुरक्षित जीवन होता है। यदि मनुष्य चेतंन हो कर, कार्य कारण मे सम्बंध स्थापित करके, योजनाबद्ध क्रम से करे, कार्य करते समय जो अनुभव हो, उसे नियम मान कर दृढ़तापूर्वक पालन करे तो उस को समस्याओं का सामना नहीँ करना पड़ेगा बल्कि विश्व में आरामदेय तल-मेल बनेगा और सुख-शांति का सामराज्य स्थापित होगा।

इस ओर हमारी सेवा जनमानस से राबता बना कर उसे अंधविश्वास, रूड़ीवाद, इलाकाई भावना और भय की मानव विरोधी शक्तियों से सावधान करके, तथ्य पूर्ण जानकारी उपलब्ध करते हुए सुखी व सुरक्षित जीवन पथ पर अग्रसर करने की है।

  जत्थेबंदी .

प्रत्येक समाज में चेतंन, रोशन दिमाग स्त्री-पुरूष होते हैं जो गरीबी, बीमारी, अशिक्षा और स्थाप्ति द्वारा जनता से किए जाते अन्याय की पीड़ा को गहराई से महसूस करते हैं और पीड़ितों को न्याय दिलाने हेतु बहुत कुछ करना भी चाहते हैं परन्तु संसाधनों की कमीं और गैर-समाजिक त्तवों का दबाव उन्हें कुछ करने नहीँ देती। कई, इन बाधाओं के बावजूद, पहल करते हैं तो उन का प्रत्येक स्तर पर विरोध होता है। उन्हें जानी-माली नुकसान का सामना भी करना पड़ता है। अंतत: वह भयभीत हो कर घर बैठ जाते हैं। इस से अनेक आदर्शवादी व्यक्ति समाज-सेवा में उतरने का साहस खो देते हैं और मानवता उन की सेवाओं से वंचित रह जाती है।

मिशन जनचेतना उन सभी के लिए, जो मानवता का विकास चाहते हैं, अपनी अज्ञानता के कारण    दुखी जीवन व्यतीत करने वालों प्रति हमदर्दी रखते हैं तथा उन की सेवा को समर्पित हैं, एक सशक्त माध्यम बनने को संकल्पित है। हमारी इच्छा है कि समाज सेवा के संकल्प वाले महानुभाव एक प्लेटफार्म पर एकत्रित हो कर गहन विचार विमर्श का भाग बनें और लिए गए निर्णयों को साहसपूर्वक लागू करने के प्रयत्न करें। हमारी मान्यता है कि सुखी, सुरक्षित मानवता के लिए ज्ञान का प्रचार, प्रसार ही एक मात्र पथ है। इस पर साथ साथ चलने से दृढ़ता भी आएगी तथा शक्ति का संकल्न भी होगा।

  सहयोग .

सुरक्षा, शांति और स्मृद्धि हेतु मनुष्य ने परिवार से राज्य तक की विभिन्न संस्थाओं की स्थापना की। समय के साथ अनेक संस्थाओं, विशेषत: राज्य ने नागरिकों की सहायता करने के स्थान पर उन का शोष्ण करना शुरू कर दिया। सुरक्षा के नाम पर उन की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाना तो सामान्य सी बात है। सत्तासीनों को अवांशित सुविधाएं प्रदान करने हेतु भारी भर्कम कर, इन से एकत्रित धन का दुरोपयोग, कुशासन, भ्रष्टाचार, सत्ता का व्यत्तिगत लाभ के लिए उपयोग आदि की शिकायतें आम हैं और इन के विरूद्ध बोलने, लिखने वाले अधिकारियों की बर्बरता का शिकार होते हैं। राज्कीय संस्थाएँ उन्हें परेशान करने हेतु किसी भी सीमा तक पहुंच जाती हैं। पुलिस द्वारा बेसिर पैर आई.एफ.आर. दर्ज कर लेना तो सामान्य सी बात मानी जाती है। न्यायालय में बड़ी परेशानी होती है, कई कई दिन जमानत ही नहीं होती। जन प्रतीनिधि भी मुलाकात को लिए समय नहीँ देते। ऐसे सामाजिक कार्यकर्ताओं से सहयोग हमारी प्राथमिकता रहेगी।

  सहायता .

पूंजीवादी समाज का आधार ही शोषण होता है। वित्तीय शोषण के विविध प्रकार हैं- अमीरी गरीबी विरासत में प्रापत होती हैं। उत्पादन से होते लाभ के अनुचित बंटवारे से गरीब और गरीब होता है तथा अमीर और अमीर। प्रत्येक वस्तु के लिए धन की अदायगी करनी पड़ती है और गरीबों को पैसे की कमी के कारण विकास के कम अवसर उपलब्ध होते हैं। यदि कोई ऋण लेकर संसाधन जुटाने के प्रयास करता है तो उस की आयु ऋण चुकाने में ही बीत जाती है। शिक्षा मंहगी होती है। इस लिए अमीर लोग ही उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाते हैं। गरीबों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अवसर ही नहीँ मिलते। यदि किसी को ऐसा अवसर मिल भी जाए ते काम तो उसे पूंजीपति के लिए ही करना पड़ता है क्योंकि संस्थानो का स्वामी वही होता है।

धन का अत्यधिक महत्व होने के कारण समाज में भ्रष्टाचार का परिचलन रहता है। कोई काम सिफारिश अथवा रिश्वत बिना नहीँ होता।

धन के प्रलोभन के कारण धर्माचारिया संप्रदायक्ता को बढ़ावा देते हैं। कर्म कांडों मे भी बढ़ोतरी होती है। धार्मिक अनुष्ठान भी बढ़ते हैं। इस में मीडिया भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेता है।

मिशन जनचेतना इत क्षेत्र में लोगों को जागृत करता है और दूसरी ओर उन्हें आय बढ़ाने, जीवन स्त्तर में सुधार लाने की चेष्टा करता है। आवश्यक्ता पड़ने पर वित्तीय सहायता का प्रावधान भी है परन्तु वास्तव सहायता पदार्थक नहीं बल्कि जीवन स्त्तर ऊँचा करने हेतु वातावर्ण का निर्माण करने की होती है। यही हमारी प्राथमिकता है।

हम प्रत्येक मनुष्य को उत्तम, बढ़िया मनुष्य बनाने का प्रयत्न करते हैं। उत्तम व्यक्ति कार्य कारण में सम्बंध स्थापित करने के सक्षम होता है, उस मे अच्छे बुरे में अंतर करने का सामर्थ्य होता है। वह दूसरों की भावनाओं की कद्र करता है, उन के अधिकारों का सम्मान  करता है और अपने अधिकारों की रक्षा करनी जानता है।

इस प्रकार मिशन जन-चेतना समय, स्थान, रंग, नस्ल, लिंग के भेद-भाव से मुक्त शांतिमय, सुरक्षित, स्मृद्ध मानवता को समर्पित विश्व व्याप्त आंदोलन है जिस की अहिंसा और जनतंत्र में आस्था है। हम जन की चेतना को जगाने और संवारने कि गतिविधियों मे संलिप्त है।

मिशन जनचेतना-III

  विचारधारा .

हमारी समस्याओं का कारण मूलत: बहुपक्षीय और सर्व-व्यापत लापरवाही है। विचार विमर्श शून्य, परिणामों से उदासीन कार्य करने की प्रवृति के चलते हमारा व्यावहार अनेक समस्याएँ पैदा करने लगा है। यदि हम प्रकृति के नियमों से अवगत होते और उन्हीं के अनुरूप जीवन व्यतीत करते तो अधिकतर समस्याएं पैदा ही नहीँ होतीँ। प्रकृति से समायोजन हमें प्यार, मोहब्बत से, सहयोग करते हुए जीने का संदेश देता जिस का परिणाम स्मृद्ध, सुरक्षित मानवता होता। हमें अज्ञानता का करूर रूप देखने, उस का बिछाया जाल पहचानने और उस में से निकलने को प्रयास करने की आवश्यक्ता है। जीवन को सतरंगी बनाने का यही एकमात्र सूत्र है।

व्यवहार में जनसाधारण में अज्ञानता के प्रसार के तीन मुख्य कारण होते हैं। सुविधा अभिलाषी      मनुष्य की प्रवृति अनुकरण करने की रहती है। नया कुछ कर, कह वह हंसी, मज़ाक का पात्र बनने से बचने का प्रयास करता है। इस लिये वह भेड-चाल अपना लेता है। दूसरी ओर सत्तासीन अधिकारी तथ्य़ों को सदैव अपने लाभ हित विकृत रूप में प्रस्तुत करते हैं। राजकीय कर्मचारी, सूचना माध्यम, मीडिया आदि सरकार द्धारा उपलब्ध किये आँकड़ों को इतनी बार और इतने विश्वासोत्पादक ढंग से प्रस्तुत करते हैं कि उन पर यकीन करना ही पड़ता है। तीसरा, सामान्य नागरिक रोज़गार में इतना व्यस्त रहता है कि उस के पास विचार विमर्श के लिये समय ही नहीँ रहता। रोज़गार सम्बंधित गतिविधियों ने उस से मेल मिलाप, विचार विमर्श की स्वतंत्रता जैसे छीन ली है।

चेतना के स्त्तर पर विचारओं की अभिव्यक्ति तथा उन पर अमल की स्वतंत्रता मानवता की बड़ी समस्या है। स्थापति ने मनुष्य को रोज़ी रोटी की समस्या में इतना जकड़ा हुआ है कि उस के पास कुछ और सोचने समझने का समय ही नहीँ है। फिर भी अपनी बुद्धी, कल्पना तथा अनुभव को कारण चेतन व्यक्ति को बहुत कुछ नया दिखाई देता है और वह उस पर अमल करना चाहता है परन्तु समाज व सरकार, तथ्यों की अनदेखी कर, सभ्यता व संस्कृति की सुरक्षा के नाम पर उसे ऐसा करने से मना करते हैं। उस का उपहास होता है और अधिकतर मामलों में उसे दंडित किया जाता है। कुछ लोग अवश्य उसे ठीक समझते हैं और उस के विचारों को अपना भी लेते हैं परन्तु इज्जत, सनमान की हानि के भय से उस की हमायत नहीं करते, खामोश रहते हैं।

हमें इस आचरण में परिवर्तन लाने की आवश्यक्ता है। मनुष्य को रोज़ी रोटी की समस्या से निजात मिलनी चाहिए ता कि उसे सोचने विचारने तथा अन्य कार्य करने हेतु समय मिल सके। दूसरा, उसे विचारों की  अभिव्यक्ति और उन पर अमल की स्वतंत्रता होनी चाहिए। हम सभी को इस का समर्थन करने की आवश्यक्ता है।

मिशन जनचेतना-IV

  शब्दावली .

आदर्श पुरूष

हमारा आदर्श, बहुधा, वह इतिहासक महामानव होते हैं जो हमारे लिए, हमारे पसंदीदा ढंग से कार्य करते रहे हैं। चाणकिया राजनैतिक तथा प्रबंधकीय क्षेत्रों में, नैतिक व अनैतिक कार्यों से सफलता प्राप्त करने वालों का आदर्श है। अशोक युद्ध विरोधी, अमन-शांति से मानवता की सेवा करने वालों का चहेता है। मानव जीवन में व्याप्त उतराव-चढ़ाव सम्बंधी संवेदनशील मनुष्य गौतम बुद्ध को आदर्श मानते हैं। शिवा जी वीरता और गुरू तेग बहादुर जी गैर-धर्मी उत्पीड़ितों के लिए कुर्बानी करने वालोँ के आदर्श हैं। ऊधम सिँह सुनाम बदलाखोरों का नायक है। भगत सिँह इन्कलाबियों का आदर्श पुरूष है। मिशन जनचेतना के लिए आदर्श पुरूष अज्ञानता मुक्त व्यक्ति है जिस में कार्य कारण सम्बंध स्थापित करने की क्षमता है और जो समुचित मानवता के विकास हेतु संकल्पबद्ध है।

दुख सुख

दुख और सुख व्यक्ति पूरक शब्द हैं। इन के अर्थ और अनुभव प्रत्येक मनुष्य के लिए भिन्न होते हैं। एक मनुष्य इस लिए दुखी है कि उस के पास खाने को कुछ भी नहीँ है जब कि दूसरा इस लिए दुखी है कि उस के पास खाने को तो आवश्यक्ता से अधिक उपलब्ध है परन्तु उस के मन माफिक नहीँ है। कोई टूटे घर में पड़ा भी सुखी है जब कि एक अन्य महल में पड़ा तारे गिन रहा है। इस प्रकार दुख सुख व्यक्ति की मनोदशा भी होते हैं और समय व स्थितिनुसार इन का रंग रूप परिवर्तित भी होता है। इस लिए इन के शब्दार्थ में परिवर्तन प्राकृतिक है परन्ति मिशन जन-चेतना में दुखी वह प्राणी है जिस की न्यूनतम आवश्यक्ताएं पूरी नहीं होतीं, जिस का जीवन असुरक्षित है, जिस को अपने विकास के लिए प्रयाप्त अवसर अपलब्ध नहीँ होते और जो अपनी भावनाएं अपने भीतर ही दबाने को अभिशप्त है।

सार्थिक मानवता

सार्थिक मानवता अज्ञानता (जिस कारण स्वार्थ, जात, जमात, रंग, स्थान  आदि के भेद भाव, अन्याय जन्म लेते हैं, नफरत पैदा होती है, युद्ध होते हैं, खून खराबा होता है) मुक्त समाज, जो सत्य, निष्ठा व न्याय पर आधारत हो तथा प्रस्पर समझदारी से सहयोग और आदर सत्कार में विश्वास रखे, की कल्पना है। निश्चय ही ऐसा समाज कार्य कारण सम्बंधों को आधार बना कर ही बन व चल सकता है।  

अज्ञानता

बहुधा जानकारी के अभाव को अज्ञानता कहा जाता बै परन्तु किसी तथ्य की जानकारी ना होना अज्ञानता की बहुत संकुचित परिभाषा है। यह संसार इतना विशाल और जटिल है कि कोई भी व्यक्ति सभी कुछ से अवगत नहीँ रह सकता। इस प्रकार तो हम सभी अज्ञानी हुए। अज्ञानता का सम्बंध जानकारी की अपेक्षा नादानी से अधिक है।

सामान्य मनुष्य समझ (चेतना) ले कर ही जन्म लेता है। इसी लिये वह जन्म के समय रोता है। जब तक वह बोलना नहीं सीख लेता, प्रत्येक बात वह रो कर ही व्यक्त करता है। भूख लगती है तो रोता है, कपड़े, बिस्तर गीला/गंदा हो जाता है तो रोता है। यह उस की समझ की निशानी माना जाता है परन्तु यह स्वंय तक सीमित होती है। जैसे जैसे वह बड़ा होता है, लोगों से मेल मिलाप बढ़ता है, उस की समझ में वृद्धि होती जाती है। बालग होने तक वह भले बुरे में अंतर करने लग जाता है।

जिस मनुष्य में अपने, अपने आस पड़ोस यानि प्रकृति, परिवार, समाज, देश दुनिया के अच्छे बुरे की तमीज़ नहीं होती और जो स्वंय तक सीमित रहता है, वह अज्ञानी है। इस प्रकार बहुत शिक्षित मनुष्य भी अज्ञानी हो सकता है और कोरा अनपढ़ भी ज्ञानी बन सकता है।

अज्ञानता निरक्षरता से भिन्न होती है। जिसे लिखना पढ़ना नहीँ आता वह निरक्षर होता है जब कि अज्ञानी चाहे साक्षर भी हो, किये जाने वाले कार्यों को संभावी परिणामों से वह अवगत नहीँ होता अथवा उन की चिन्ता नहीँ करता। निरक्षरता का सम्बंध ना जानने से होता है जबकि अज्ञानता धूर्तता की श्रेणी मेँ आती है। इस प्रकार अज्ञानता, समाज के लिये, निरक्षरता से अधिक घातक होती है।

अज्ञानता मनुष्य की सभी समस्याओं की जड़ है। यह भूख, गरीबी, बीमारी, अंध-विश्वास, सांप्रदायक्ता, अत्तिवाद की जननी है। अज्ञानता मनुष्य को स्वार्थी बनाती है, शोषण करना सिखलाती है। यह नफरत फैलाती है, जंगों-युद्धों का मूल है, तबाही का कारण है।

व्यवहार में जनसाधारण में अज्ञानता के प्रसार के तीन मुख्य कारण होते हैं। सुविधा अभिलाषी      मनुष्य की प्रवृति अनुकरण करने की रहती है। नया कुछ कर, कह वह हंसी, मज़ाक का पात्र बनने से बचने का प्रयास करता है। इस लिये वह भेड-चाल अपना लेता है। दूसरी ओर सत्तासीन अधिकारी तथ्य़ों को सदैव अपने लाभ हित विकृत रूप में प्रस्तुत करते हैं। राजकीय कर्मचारी, सूचना माध्यम, मीडिया आदि सरकार द्धारा उपलब्ध किये आँकड़ों को इतनी बार और इतने विश्वासोत्पादक ढंग से प्रस्तुत करते हैं कि उन पर यकीन करना ही पड़ता है। तीसरा, सामान्य नागरिक रोज़गार में इतना व्यस्त रहता है कि उस के पास विचार विमर्श के लिये समय ही नहीँ रहता। रोज़गार सम्बंधित गतिविधियों ने उस से मेल मिलाप, विचार विमर्श की स्वतंत्रता जैसे छीन ली है।

कार्य-कारण सम्बंध

सचेत करे या अचेत, मनुष्य के प्रत्येक कार्य का कोई कारण होता है और प्रत्येक कार्य का, अच्छा हो या बुरा, परिणाम होता है। सोने से पहले घड़ी में अलार्म प्रात: समय पर जागने हेतु लगाया जाता है। समय पर उठने का परिणाम सभी कामों का वांछित परिणामों से निपटने में निकलता है। ऐसा ना हो तो भगदड़ मचती है, कई काम छूट जाते हैं, कुछ अधूरे हो पाते हैं और कई जल्दबाज़ी में गलत हो जाते हैं। अचेत किए कार्यों के भी परिणाम निकलते हैं। बेध्यानी से केला खा कर छिल्का सड़क पर फैंकने के भयाव्ह परिणाम निकल सकते हैं। मस्ती में चल रहा कोई मनुष्य केले के छिल्के पर पांव पड़ने से तिलेक कर गिर सकता है, उस का सिर फट सकता है, लात-बाजू टूट सकते हैं। इस प्रकार जन जीवन मे किए गए प्रत्येक कार्य का कारण होता है और उनका नागरिकों पर प्रभाव पड़ता है। मनुष्य को प्रत्येक कार्य सोच समझ कर, कार्य कारण का सम्बंध स्थापित करके करना चाहिए। 

क्या? क्यों?किस लिए?

क्या? क्यों? किस लिए? प्रश्न कार्य कारण सम्बंधों का सरल रूप है। विचार विमर्श दौरान मिश्नरी साथियों का सुझाव होता है कि जन साधारण से सम्पर्क उनहीं की सरल भाषा में होना चाहिए। कार्य कारण सम्बंध स्थापित करना जटिल है। इस के स्थान पर यदि कोई कार्य करने का निर्णय लेने से पूर्व क्या? क्यों? किस लिए? जैसे प्रश्न विचार लिए जाएं तो निर्णय लेने सुगम भी हो जाते हैं और वह बहुधा सही भी होते हैं। सही निर्णय सदैव अपने, समाज, देश सथा समुची मानवता यानि सरबत के भले के लिए होते हैं।